उत्तर प्रदेश के छोटे से गांव रामपुर खेड़ा में सुबह का सूरज धीरे-धीरे खेतों पर फैल रहा था। चारों तरफ हरियाली थी, कच्ची गलियों में गायें घूम रही थीं, और गांव की औरतें सिर पर पानी के घड़े रखे कुएं से लौट रही थीं। लेकिन उस गांव के एक घर में कई सालों से खुशियां नहीं थीं। उस घर में रहता था 18 साल का अर्जुन अपने पिता रघुवीर के साथ। अर्जुन की मां की मौत तब हो गई थी जब वो सिर्फ 10 साल का था। उस दिन के बाद उसका घर घर नहीं… सिर्फ चार दीवारें बनकर रह गया था। रघुवीर पहले बहुत हंसमुख इंसान था, लेकिन पत्नी की मौत के बाद वो अंदर से टूट गया। धीरे-धीरे उसने शराब पीना शुरू कर दिया। गांव वाले अक्सर कहते थे— “बेचारा रघुवीर… अकेले आदमी की जिंदगी बड़ी मुश्किल होती है…” अर्जुन चुपचाप सब सुनता रहता। उसने छोटी उम्र में ही जिम्मेदारियां उठानी शुरू कर दी थीं। सुबह खेत पर काम… दोपहर में मजदूरी… और रात को घर का सारा काम। उसकी जिंदगी बस काम और थकान में गुजर रही थी। लेकिन अर्जुन का एक सपना था— वो पढ़-लिखकर गांव से बाहर जाना चाहता था। उसे मशीनों और ट्रैक्टरों में बहुत दिलचस्पी थी। जब भी गांव में कोई ट्रैक्टर खराब होता...