काले कुएं का डरावना राज

 





उत्तर प्रदेश के एक छोटे और पुराने गांव देवगढ़ में एक ऐसा कुआं था…

जिसके पास रात में जाने की हिम्मत कोई नहीं करता था।


गांव के बुजुर्ग कहते थे कि उस कुएं में एक औरत की आत्मा रहती है।

एक ऐसी औरत… जो रात होते ही रोती थी।


और जो भी उसकी आवाज सुनकर कुएं के पास गया…

वो कभी वापस नहीं आया।


गांव वाले उस जगह को “काले कुएं” के नाम से जानते थे।


दिन में भी वहां अजीब सा सन्नाटा रहता था।

कुएं के आसपास बड़े-बड़े सूखे पेड़ थे।

उनकी टेढ़ी-मेढ़ी शाखाएं हवा चलने पर ऐसे हिलती थीं जैसे कोई हाथ बुला रहा हो।


लेकिन गांव के कुछ लड़के इन बातों को सिर्फ अफवाह मानते थे।


उन्हीं लड़कों में एक था 21 साल का वीर।


वीर गांव का सबसे निडर लड़का माना जाता था।

लंबा कद, मजबूत शरीर, और आंखों में हमेशा चुनौती का घमंड।


वो अक्सर गांव वालों से कहता—


“भूत-प्रेत कुछ नहीं होते… ये सब लोगों का डर है।”


वीर के साथ उसका दोस्त गुड्डू भी रहता था।

लेकिन गुड्डू वीर जितना बहादुर नहीं था।


एक रात गांव में चौपाल लगी हुई थी।

कुछ बूढ़े लोग फिर उसी कुएं की बातें कर रहे थे।


एक बूढ़ा आदमी कांपती आवाज में बोला—


“मैंने अपनी आंखों से देखा था… आधी रात को सफेद साड़ी में एक औरत कुएं के पास बैठी रो रही थी…”


दूसरा आदमी बोला—


“पिछले साल रमेश भी वहीं गया था… अगले दिन उसकी लाश खेतों में मिली थी…”


गुड्डू डर गया।


लेकिन वीर हंस पड़ा।


“तुम लोगों ने डर को ही भूत बना दिया है।”


एक बूढ़े ने गुस्से में कहा—


“अगर इतना ही भरोसा है… तो आज रात उस कुएं पर जाकर दिखा।”


पूरा चौपाल अचानक शांत हो गया।


सबकी नजरें वीर पर टिक गईं।


वीर मुस्कुराया।


“ठीक है… आज रात मैं वहीं जाऊंगा।”


गुड्डू घबरा गया।


“पागल हो गया है क्या?”


लेकिन वीर नहीं माना।


उस रात करीब 12 बजे वीर और गुड्डू टॉर्च लेकर गांव के बाहर निकल पड़े।


आसमान में बादल थे।

चारों तरफ घना अंधेरा फैला हुआ था।


हवा इतनी ठंडी थी कि शरीर कांप जाए।


जैसे-जैसे दोनों कुएं के पास पहुंच रहे थे…

वैसे-वैसे माहौल डरावना होता जा रहा था।


पेड़ों की शाखाएं हवा में अजीब आवाज कर रही थीं।

कहीं दूर उल्लू की आवाज सुनाई दे रही थी।


गुड्डू डरते हुए बोला—


“वीर… वापस चलते हैं…”


लेकिन वीर आगे बढ़ता रहा।


कुछ देर बाद दोनों उस पुराने कुएं के सामने खड़े थे।


कुआं बहुत पुराना था।

उसकी ईंटें काली पड़ चुकी थीं।

चारों तरफ घास उगी हुई थी।


अचानक हवा और तेज हो गई।


गुड्डू के हाथ कांपने लगे।


तभी…


उन्हें किसी औरत के रोने की आवाज सुनाई दी।


धीमी… दर्द भरी… डरावनी आवाज।


गुड्डू की हालत खराब हो गई।


“वीर… ये आवाज कहां से आ रही है?”


वीर भी पहली बार थोड़ा घबरा गया।


आवाज कुएं के अंदर से आ रही थी।


दोनों धीरे-धीरे कुएं के पास पहुंचे।


वीर ने टॉर्च अंदर डाली।


नीचे सिर्फ अंधेरा था।













लेकिन तभी अचानक…


एक सफेद हाथ कुएं के अंदर से बाहर निकला।


गुड्डू जोर से चीखा—


“भाssssग!”


दोनों जान बचाकर भागने लगे।


लेकिन तभी वीर को एहसास हुआ कि गुड्डू उसके पीछे नहीं है।


वो तुरंत रुका।


“गुड्डू!”


चारों तरफ सन्नाटा था।


गुड्डू गायब हो चुका था।


वीर का दिल डर से कांप उठा।


“गुड्डू!”


उसने फिर आवाज लगाई।


लेकिन तभी पीछे से वही औरत की रोने की आवाज फिर सुनाई दी।


धीरे-धीरे… बिल्कुल उसके कान के पास…


वीर ने कांपते हुए पीछे मुड़कर देखा…


और उसकी चीख निकल गई वीर की चीख रात के सन्नाटे में दूर तक गूंज गई।


उसके सामने एक औरत खड़ी थी।


लंबे बिखरे हुए बाल…

सफेद गंदी साड़ी…

चेहरा आधा अंधेरे में छिपा हुआ…

और आंखें… बिल्कुल काली।


वीर के हाथ से टॉर्च नीचे गिर गई।


उसकी सांसें रुकने लगीं।


औरत धीरे-धीरे उसकी तरफ बढ़ रही थी।


उसके पैरों की आवाज तक नहीं आ रही थी।


सिर्फ उसके रोने की डरावनी आवाज सुनाई दे रही थी।


वीर पहली बार जिंदगी में इतना डरा था।


उसने कांपती आवाज में कहा—


“क… कौन हो तुम?”


लेकिन औरत ने कोई जवाब नहीं दिया।


वो बस धीरे-धीरे उसके और करीब आती गई।


तभी अचानक तेज हवा चली।


पेड़ जोर-जोर से हिलने लगे।

कुएं के अंदर से अजीब फुसफुसाहट की आवाज आने लगी।


वीर घबरा गया और पूरी ताकत से गांव की तरफ भागने लगा।


उसके पीछे वो रोने की आवाज लगातार सुनाई दे रही थी।


ऐसा लग रहा था जैसे कोई उसके बिल्कुल पीछे दौड़ रहा हो।


वीर बिना पीछे देखे भागता रहा।


कुछ देर बाद उसे गांव की हल्की रोशनी दिखाई दी।


वो हांफता हुआ चौपाल के पास पहुंचा और जमीन पर गिर पड़ा।


गांव वाले तुरंत उसके पास दौड़े।


“क्या हुआ?”

“गुड्डू कहां है?”


वीर कांप रहा था।

उसके मुंह से आवाज तक नहीं निकल रही थी।


कुछ देर बाद उसने टूटती आवाज में कहा—


“वो… सच है…”













पूरा गांव सन्न रह गया।


“कौन सच है?”


वीर की आंखों में डर साफ दिखाई दे रहा था।


“कुएं वाली औरत…”


इतना सुनते ही कई औरतें डर के मारे भगवान का नाम लेने लगीं।


लेकिन गांव के कुछ लोग अभी भी मानने को तैयार नहीं थे।


सरपंच ने कहा—


“पहले गुड्डू को ढूंढो!”


तुरंत गांव के कई आदमी लालटेन और डंडे लेकर कुएं की तरफ निकल पड़े।


वीर भी डरते हुए उनके साथ गया।


रात और भी ज्यादा डरावनी हो चुकी थी।


आसमान में बिजली चमक रही थी।

हवा में अजीब ठंडक थी।


कुछ देर बाद सब लोग कुएं के पास पहुंच गए।


लेकिन वहां का नजारा देखकर सबके होश उड़ गए।


गुड्डू की चप्पल कुएं के पास पड़ी थी।


और जमीन पर घसीटने के निशान बने हुए थे…

जो सीधे कुएं की तरफ जा रहे थे।


एक बूढ़ा आदमी कांपती आवाज में बोला—


“मैंने कहा था… वो किसी को जिंदा नहीं छोड़ती…”


सरपंच ने कुछ आदमियों को कुएं के अंदर देखने को कहा।


रस्सी बांधकर एक आदमी नीचे उतरा।


पूरा गांव सांस रोके खड़ा था।


कुछ मिनट बाद अचानक नीचे से डरावनी चीख सुनाई दी।


“ऊपर खींचो! जल्दी!”


लोगों ने घबराकर रस्सी खींची।


जब वो आदमी ऊपर आया… उसका चेहरा सफेद पड़ चुका था।


वो कांप रहा था।


“क्या हुआ?”


उस आदमी ने डरते हुए कहा—


“नीचे… नीचे कोई है…”


“कौन?”


“एक औरत… पानी के अंदर बैठी थी… उसकी आंखें खुली हुई थीं…”


इतना सुनते ही गांव में अफरा-तफरी मच गई।


कुछ लोग डर के मारे भागने लगे।


लेकिन तभी अचानक कुएं के अंदर से जोर-जोर से हंसने की आवाज आने लगी।


एक औरत की डरावनी हंसी।


पूरा माहौल कांप उठा।


हवा अचानक बहुत ठंडी हो गई।


और अगले ही पल…


कुएं के अंदर से गुड्डू की आवाज आई—


“वीर… मुझे बचा ले…”


वीर के शरीर में सिहरन दौड़ गई।


“गुड्डू!”


वो तुरंत कुएं की तरफ भागा।


लेकिन गांव वालों ने उसे पकड़ लिया।


“पागल हो गया है? नीचे मत जा!”


गुड्डू की आवाज फिर आई—


“वीर… वो मुझे मार डालेगी…”


उसकी आवाज दर्द से भरी हुई थी।


वीर खुद को छुड़ाने लगा।


“मुझे जाने दो!”


लेकिन तभी अचानक आवाज बंद हो गई।


चारों तरफ फिर सन्नाटा छा गया।


कुछ सेकंड बाद कुएं के अंदर से पानी में कुछ गिरने की आवाज आई।


“छपाक!”


और फिर… सब शांत।


वीर की आंखों से आंसू बहने लगे।


उसे लगने लगा कि उसने अपने दोस्त को खो दिया।


अगली सुबह गांव में डर फैल चुका था।


किसी ने भी रात की घटना के बाद घर से बाहर निकलने की हिम्मत नहीं की।


गुड्डू अभी तक नहीं मिला था।


गांव की औरतें मंदिर में पूजा कर रही थीं।

बच्चे रो रहे थे।

हर तरफ सिर्फ डर था।


वीर पूरी रात नहीं सोया।


उसके दिमाग में बार-बार वही काली आंखों वाली औरत घूम रही थी।


उसे खुद पर गुस्सा आ रहा था।


अगर वो गुड्डू को वहां ना ले जाता…

तो शायद आज वो जिंदा होता।


दोपहर में वीर गांव के सबसे बूढ़े आदमी दाताराम बाबा के पास गया।


दाताराम बाबा गांव के पुराने किस्सों के बारे में सब जानते थे।


वीर ने कांपती आवाज में पूछा—


“बाबा… वो औरत कौन है?”


दाताराम बाबा कुछ देर चुप रहे।


फिर उन्होंने भारी आवाज में कहा—


“उस कुएं का राज बहुत पुराना है…”


वीर ध्यान से सुनने लगा।


बाबा बोले—


“करीब 25 साल पहले इस गांव में एक औरत रहती थी… उसका नाम था चंदा।”


“चंदा बहुत सुंदर थी। लेकिन गांव के जमींदार की उस पर बुरी नजर थी…”


“एक रात जमींदार और उसके आदमी उसे जबरदस्ती उठाकर ले गए…”


वीर की आंखें फैल गईं।


बाबा की आवाज कांपने लगी।


“अगले दिन चंदा की लाश उसी कुएं में मिली…”


वीर के शरीर में सिहरन दौड़ गई।


“लेकिन गांव वालों ने डर की वजह से कभी सच नहीं बोला…”


“और तभी से उसकी आत्मा उस कुएं में भटक रही है…”


वीर चुप हो गया।


अब उसे समझ आ रहा था कि वो औरत सिर्फ भूत नहीं…

एक अधूरी चीख थी।


लेकिन तभी दाताराम बाबा ने उसकी तरफ देखकर धीरे से कहा—


“लेकिन एक बात और है…”


वीर ने पूछा—


“क्या?”


बाबा की आंखों में डर उतर आया।


“आज तक जो भी उस कुएं पर गया… वो या तो मर गया… या पागल हो गया…”


“और अब… उसकी नजर तुम पर पड़ चुकी है…”


इतना सुनते ही वीर के पैरों तले जमीन खिसक गई।


उसी समय बाहर से अचानक किसी औरत के रोने की आवाज सुनाई दी…


धीमी… दर्द भरी… बिल्कुल वही आवाज…


जो उस रात कुएं से आ रही थी दाताराम बाबा की झोपड़ी के बाहर वही डरावनी रोने की आवाज लगातार गूंज रही थी।


धीमी… दर्द भरी…

ऐसी आवाज जिसे सुनकर इंसान के शरीर में सिहरन दौड़ जाए।


वीर का गला सूख गया।


उसने कांपते हुए बाबा की तरफ देखा।


“बा… बाबा… ये आवाज…”


दाताराम बाबा का चेहरा सफेद पड़ चुका था।


उन्होंने तुरंत दरवाजे के पास जाकर बाहर झांका।


लेकिन बाहर कोई नहीं था।


सिर्फ तेज हवा चल रही थी।

सूखे पेड़ हिल रहे थे।

और शाम का अंधेरा पूरे गांव पर धीरे-धीरे उतर रहा था।


फिर भी वो रोने की आवाज साफ सुनाई दे रही थी।


ऐसा लग रहा था जैसे कोई औरत बहुत पास खड़ी होकर रो रही हो।


दाताराम बाबा जल्दी से अंदर आए और दरवाजा बंद कर दिया।


“आज रात घर से बाहर मत निकलना वीर…”


उनकी आवाज में डर साफ था।


लेकिन वीर के दिमाग में सिर्फ एक बात घूम रही थी—


“गुड्डू अभी भी जिंदा हो सकता है…”


उसने दृढ़ आवाज में कहा—


“मैं अपने दोस्त को ऐसे नहीं छोड़ सकता बाबा।”


दाताराम बाबा ने गहरी सांस ली।


“जिस चीज से तुम लड़ने जा रहे हो… वो इंसान नहीं है।”


वीर चुप हो गया।


लेकिन उसके अंदर डर से ज्यादा अपराधबोध था।


अगर वो उस रात अपनी बहादुरी ना दिखाता…

तो गुड्डू आज गायब ना होता।


शाम होते-होते पूरे गांव में डर फैल चुका था।


हर घर के दरवाजे जल्दी बंद हो गए।

औरतें बच्चों को घर से बाहर नहीं निकलने दे रही थीं।


कुछ लोग मंदिर में बैठकर भजन गा रहे थे।


लेकिन गांव के ऊपर अजीब सा डर मंडरा रहा था।


उधर वीर अपने घर के कमरे में बैठा था।


उसकी आंखों के सामने बार-बार वही काली आंखों वाली औरत आ रही थी।


तभी अचानक उसे कुछ याद आया।


उस रात जब वो कुएं के पास था…

तब उस औरत के हाथ में कुछ चमक रहा था।


उसे ठीक से दिखाई नहीं दिया था… लेकिन वो किसी पायल जैसा लग रहा था।


वीर सोच में पड़ गया।


क्या चंदा की आत्मा कुछ बताना चाहती थी?


रात करीब 11 बजे अचानक उसके कमरे की खिड़की अपने आप खुल गई।


“धड़ाम!”


वीर डरकर खड़ा हो गया।


बाहर तेज हवा चल रही थी।


लेकिन अगले ही पल उसकी सांस रुक गई।


खिड़की के बाहर…

अंधेरे में…

एक औरत खड़ी थी।


सफेद साड़ी…

लंबे बिखरे बाल…

और काली आंखें।


वीर डर के मारे पीछे हट गया।


औरत धीरे-धीरे अपना हाथ उठाने लगी।


उसकी उंगलियां कुएं की दिशा में इशारा कर रही थीं।


फिर अचानक वो गायब हो गई।


वीर के पूरे शरीर में कंपकंपी दौड़ गई।


उस रात उसे बिल्कुल नींद नहीं आई।


सुबह होते ही वो फिर दाताराम बाबा के पास पहुंचा।


उसने सारी बात बता दी।


बाबा कुछ देर सोचते रहे।


फिर धीरे से बोले—


“हो सकता है उसकी आत्मा तुमसे कुछ चाहती हो।”


“क्या?”


“शायद इंसाफ…”


वीर ध्यान से सुनने लगा।


बाबा बोले—


“जिस रात चंदा मरी थी… उस रात गांव के चार बड़े आदमी उसके साथ थे। लेकिन किसी ने कभी सच नहीं बोला।”


वीर ने पूछा—


“अब वो लोग कहां हैं?”


बाबा का चेहरा गंभीर हो गया।


“तीन लोग मर चुके हैं…”


“और चौथा?”


बाबा ने धीरे से कहा—


“वो अभी जिंदा है…”


“कौन?”


“ठाकुर रणवीर सिंह…”


ये नाम सुनते ही वीर चौंक गया।


ठाकुर रणवीर गांव का सबसे अमीर और ताकतवर आदमी था।


उसकी हवेली गांव के बाहर थी।

लोग आज भी उससे डरते थे।


बाबा ने धीमी आवाज में कहा—


“लोग कहते हैं… उसी ने चंदा को मरवाया था।”


वीर के अंदर गुस्सा भर गया।


अगर ये सच था…

तो चंदा की आत्मा बदला चाहती थी।


उसी समय गांव में अचानक शोर मचने लगा।


“कोई कुएं के पास बेहोश पड़ा है!”


वीर तुरंत बाहर भागा।


पूरा गांव कुएं की तरफ दौड़ रहा था।


कुछ देर बाद जब वीर वहां पहुंचा…

तो उसका दिल बैठ गया।


जमीन पर गुड्डू पड़ा था।


उसके कपड़े पूरी तरह गीले थे।

चेहरा सफेद पड़ चुका था।

और आंखें डरी हुई थीं।


“गुड्डू!”


वीर तुरंत उसके पास बैठ गया।


गुड्डू कांप रहा था।


उसके होंठ सूख चुके थे।


गांव वाले डर के मारे दूर खड़े थे।


कुछ देर बाद गुड्डू ने धीरे-धीरे आंखें खोलीं।


उसकी आंखों में ऐसा डर था… जैसा किसी ने मौत को करीब से देखा हो।


वीर ने जल्दी से पूछा—


“क्या हुआ था?”


गुड्डू की सांसें तेज हो गईं।


वो कांपती आवाज में बोला—


“वो… वो मुझे नीचे ले गई थी…”


पूरा गांव सन्न रह गया।


“कौन?”


गुड्डू की आंखों से आंसू बहने लगे।


“कुएं वाली औरत…”


कुछ औरतें डर के मारे भगवान का नाम लेने लगीं।


गुड्डू बोला—


“नीचे… कुएं के अंदर… एक कमरा है…”


वीर की आंखें फैल गईं।


“कमरा?”


गुड्डू कांपते हुए बोला—


“हां… पानी के नीचे…”


“वो मुझे वहां ले गई… वहां बहुत सारी हड्डियां थीं…”


पूरा गांव डर से कांप उठा।


गुड्डू की आवाज टूटने लगी।


“और दीवार पर खून से लिखा था —

‘मुझे इंसाफ चाहिए…’”


वीर का दिल तेजी से धड़कने लगा।


अब उसे यकीन हो चुका था कि चंदा की आत्मा सिर्फ लोगों को मार नहीं रही…

वो अपना सच दुनिया के सामने लाना चाहती है।


लेकिन तभी अचानक गुड्डू जोर-जोर से कांपने लगा।


उसकी आंखें पूरी तरह काली होने लगीं।


पूरा गांव डर गया।


गुड्डू अचानक अजीब आवाज में बोलने लगा—


“वो वापस आएगा…”


वीर घबरा गया।


“कौन वापस आएगा?”


गुड्डू की आवाज अब किसी औरत जैसी हो चुकी थी।


“रणवीर सिंह…”


इतना कहकर गुड्डू जोर से चीखा…


और फिर बेहोश हो गया।


पूरा गांव डर के मारे पीछे हट गया।


वीर समझ चुका था…

अब ये सिर्फ भूत की कहानी नहीं रही।


ये 25 साल पुराने पाप का राज था…

जो अब धीरे-धीरे बाहर आने वाला था गुड्डू के बेहोश होते ही पूरे गांव में अफरा-तफरी मच गई।


कुछ औरतें डर के मारे रोने लगीं।

बच्चे अपनी मांओं से चिपक गए।

और कई आदमी धीरे-धीरे पीछे हटने लगे।


गांव वालों की आंखों में सिर्फ एक ही डर था—


“चंदा की आत्मा वापस आ चुकी है…”


वीर जमीन पर बैठे अपने दोस्त का चेहरा देख रहा था।


गुड्डू की सांसें बहुत तेज चल रही थीं।

उसका पूरा शरीर कांप रहा था।


तभी अचानक गुड्डू ने आंखें खोल दीं।


लेकिन इस बार उसकी आंखें सामान्य नहीं थीं।


उनकी पुतलियां पूरी तरह काली हो चुकी थीं।


उसने धीरे-धीरे वीर की तरफ देखा।


और फिर एक ऐसी आवाज में बोला…

जो उसकी अपनी आवाज नहीं थी।


“सच… कुएं के नीचे छिपा है…”


पूरा गांव डर के मारे कांप उठा।


वीर की सांस रुक गई।


“कौन हो तुम?”


गुड्डू के होंठ धीरे-धीरे मुस्कुराने लगे।


लेकिन वो मुस्कान इंसानी नहीं थी।


“मैं… चंदा…”


इतना सुनते ही कई लोग चीख पड़े।


एक बूढ़ी औरत वहीं बेहोश हो गई।


दाताराम बाबा कांपते हुए आगे बढ़े।


उन्होंने जल्दी से भगवान का नाम लिया और गुड्डू के सिर पर गंगाजल छिड़का।


अचानक गुड्डू जोर से चीखा।


उसकी आंखें पलट गईं…

और वो फिर बेहोश हो गया।


चारों तरफ सन्नाटा छा गया।


वीर का दिल तेजी से धड़क रहा था।


अब उसे पूरी तरह यकीन हो चुका था कि ये कोई साधारण घटना नहीं है।


चंदा की आत्मा सच में इंसाफ चाहती थी।


लेकिन सबसे बड़ा सवाल अभी भी वही था—


कुएं के नीचे आखिर ऐसा क्या छिपा था?


शाम होते-होते गांव में खबर फैल गई कि गुड्डू के अंदर आत्मा आ गई थी।


अब पूरा गांव डर में जी रहा था।


कोई भी सूर्य ढलने के बाद घर से बाहर नहीं निकल रहा था।


लेकिन वीर का डर अब धीरे-धीरे जिद में बदल रहा था।


वो सच जानना चाहता था।


उस रात वीर फिर दाताराम बाबा के पास गया।


बाबा मंदिर के बाहर बैठे मंत्र पढ़ रहे थे।


उनके चेहरे पर चिंता साफ दिखाई दे रही थी।


वीर ने गंभीर आवाज में पूछा—


“बाबा… कुएं के नीचे क्या है?”


दाताराम बाबा कुछ सेकंड चुप रहे।


फिर धीरे से बोले—


“उस कुएं के नीचे एक पुरानी सुरंग है…”


वीर हैरान रह गया।


“सुरंग?”


“हां… बहुत साल पहले जमींदारों ने अंग्रेजों के समय वो सुरंग बनवाई थी।”


“लेकिन अब वो रास्ता बंद हो चुका है।”


वीर ध्यान से सुनने लगा।


बाबा आगे बोले—


“जिस रात चंदा की मौत हुई… लोगों ने कहा था कि उसकी लाश कुएं में मिली थी। लेकिन असली सच किसी को नहीं पता…”


“क्या मतलब?”


बाबा की आंखों में डर उतर आया।


“मुझे लगता है… चंदा की लाश आज भी उसी सुरंग में छिपी है।”


वीर के शरीर में सिहरन दौड़ गई।


अगर ये सच था…

तो 25 साल से एक निर्दोष लड़की की आत्मा इंसाफ के लिए भटक रही थी।


वीर ने फैसला कर लिया।


“मैं कुएं के नीचे जाऊंगा।”


दाताराम बाबा डर गए।


“पागल हो गए हो? वहां मौत है!”


लेकिन वीर अब रुकने वाला नहीं था।


उसे लग रहा था कि अगर उसने सच बाहर नहीं निकाला…

तो चंदा की आत्मा कभी शांत नहीं होगी।


अगले दिन सुबह वीर ने गांव के कुछ लड़कों को साथ आने के लिए कहा।


लेकिन कोई तैयार नहीं हुआ।


सब डर चुके थे।


आखिरकार सिर्फ गुड्डू ही उसके साथ जाने को तैयार हुआ।


हालांकि गुड्डू अभी भी डरा हुआ था।


“अगर वो फिर आ गई तो?”


वीर ने उसके कंधे पर हाथ रखा।


“इस बार हम भागेंगे नहीं।”


दोपहर तक दोनों ने रस्सी, टॉर्च और कुछ सामान तैयार कर लिया।


पूरा गांव उन्हें रोकने की कोशिश कर रहा था।


एक बूढ़ा आदमी बोला—


“जो भी उस कुएं में गया… वो वापस नहीं आया!”


लेकिन वीर ने किसी की नहीं सुनी।


शाम होते ही दोनों कुएं के पास पहुंच गए।


आज वहां का माहौल पहले से भी ज्यादा डरावना था।


आसमान में काले बादल थे।

हवा में सड़ी हुई बदबू फैली हुई थी।


कुएं के आसपास बैठे कौवे अजीब आवाजें निकाल रहे थे।


गुड्डू के हाथ कांपने लगे।


“वीर… मुझे अच्छा नहीं लग रहा…”


लेकिन तभी अचानक कुएं के अंदर से वही रोने की आवाज आने लगी।


धीमी… दर्द भरी…


वीर ने गहरी सांस ली।


“चलो…”


उसने रस्सी बांधी और धीरे-धीरे नीचे उतरने लगा।


गुड्डू भी डरते हुए उसके पीछे आया।


जैसे-जैसे दोनों नीचे जा रहे थे…

वैसे-वैसे ठंड बढ़ती जा रही थी।


कुएं की दीवारें काली और गीली थीं।


नीचे सिर्फ अंधेरा था।


कुछ देर बाद दोनों पानी तक पहुंच गए।


पानी बर्फ जैसा ठंडा था।


अचानक वीर की टॉर्च की रोशनी दीवार पर पड़ी…


और उसका दिल रुक गया।


दीवार पर खून से लिखा था—


“मुझे न्याय चाहिए…”


गुड्डू डर के मारे पीछे हट गया।


लेकिन तभी वीर की नजर एक टूटी हुई दीवार पर पड़ी।


उसके पीछे एक छोटा रास्ता दिखाई दे रहा था।


“शायद यही सुरंग है…”


दोनों धीरे-धीरे अंदर जाने लगे।


सुरंग बहुत पुरानी थी।

दीवारों से पानी टपक रहा था।

चारों तरफ बदबू फैली हुई थी।


कुछ कदम आगे बढ़ते ही अचानक गुड्डू चीख पड़ा।


“वीर!”


वीर ने टॉर्च नीचे की तरफ घुमाई।


और अगले ही पल उसके हाथ कांपने लगे।


जमीन पर इंसानों की हड्डियां पड़ी थीं।


बहुत सारी हड्डियां।


कुछ पुराने कपड़े भी पड़े थे।


गुड्डू की हालत खराब हो गई।


“ये… ये सब क्या है?”


वीर कुछ बोल नहीं पाया।


तभी अचानक सुरंग के अंदर तेज हवा चलने लगी।


और फिर…


अंधेरे में किसी औरत की हंसी गूंज उठी।


धीमी… लेकिन बेहद डरावनी।


दोनों डरकर पीछे हट गए।


लेकिन तभी वीर की टॉर्च एक कोने पर पड़ी।


वहां एक पुराना लोहे का संदूक रखा था।


संदूक आधा जंग खा चुका था।


वीर धीरे-धीरे उसके पास गया।


उसने कांपते हाथों से संदूक खोला।


अंदर कुछ पुराने कपड़े…

एक पायल…

और कुछ पीले पड़े कागज रखे थे।


वीर ने कागज उठाया।


वो किसी लड़की की डायरी थी।


पहले पन्ने पर नाम लिखा था—


“चंदा…”


वीर की सांसें तेज हो गईं।


उसने जल्दी से अगला पन्ना खोला।


और जो लिखा था…

उसे पढ़कर उसके होश उड़ गए सुरंग के अंदर गहरा अंधेरा फैला हुआ था।


दीवारों से पानी टपक रहा था।

चारों तरफ सड़ी हुई बदबू थी।


वीर के हाथ कांप रहे थे।


उसने टॉर्च की रोशनी डायरी पर डाली और धीरे-धीरे पढ़ना शुरू किया।


पहले कुछ पन्नों में चंदा ने अपनी जिंदगी के बारे में लिखा था।

उसके सपने…

उसकी मां…

उसकी छोटी सी दुनिया।


लेकिन जैसे-जैसे वीर आगे पढ़ता गया…

उसका चेहरा गुस्से और डर से भरता गया।


डायरी में लिखा था—


“ठाकुर रणवीर सिंह कई महीनों से मुझे परेशान कर रहा है…”


“आज उसने फिर मुझे हवेली बुलाया…”


“अगर मेरे साथ कुछ हो जाए… तो इसके जिम्मेदार ठाकुर और उसके आदमी होंगे…”


गुड्डू की सांसें रुकने लगीं।


“मतलब… चंदा सच कह रही थी…”


वीर ने अगला पन्ना खोला।


उस पर कुछ जगह खून के निशान थे।


लिखावट कांप रही थी।


“आज रात वो लोग मुझे जबरदस्ती उठाकर ले आए…”


“मैं बहुत चिल्लाई… लेकिन किसी ने मेरी मदद नहीं की…”


“अगर ये डायरी किसी को मिले… तो मुझे इंसाफ जरूर दिलाना…”


इसके बाद पन्ना अधूरा था।


जैसे किसी ने लिखते-लिखते उसे रोक दिया हो।


वीर की आंखों में गुस्सा भर गया।


25 साल पहले गांव वालों ने डर की वजह से सच छुपा दिया था।


और उसी पाप की वजह से आज भी चंदा की आत्मा भटक रही थी।


तभी अचानक सुरंग के अंदर जोर-जोर से हवा चलने लगी।


टॉर्च की रोशनी कांपने लगी।


गुड्डू डर के मारे पीछे हट गया।


“वीर… कोई है यहां…”


अचानक अंधेरे में वही रोने की आवाज गूंज उठी।


धीमी… दर्द भरी…


और अगले ही पल…


सुरंग के दूसरे छोर पर सफेद साड़ी पहने वही औरत दिखाई दी।


चंदा।


उसके लंबे बाल हवा में उड़ रहे थे।

चेहरा आधा सड़ा हुआ था।

और आंखों से काला पानी बह रहा था।


गुड्डू चीख पड़ा।


लेकिन इस बार वीर भागा नहीं।


उसने कांपती आवाज में कहा—


“तुम्हारे साथ गलत हुआ था… मैं सच सबके सामने लाऊंगा।”


अचानक रोने की आवाज बंद हो गई।


चंदा कुछ सेकंड तक वीर को देखती रही।


फिर उसने धीरे-धीरे अपना हाथ सुरंग के आखिरी हिस्से की तरफ उठाया।


वीर ने टॉर्च वहां घुमाई।


और अगले ही पल उसका दिल बैठ गया।


दीवार के पास इंसानी कंकाल पड़ा था।


उसके पैरों में वही पायल थी…

जो संदूक में रखी दूसरी पायल से मिलती थी।


गुड्डू कांपते हुए बोला—


“ये… ये चंदा की लाश है…”


वीर समझ गया।


25 साल पहले चंदा को मारकर उसकी लाश यहीं छिपा दी गई थी।


तभी अचानक चंदा की आत्मा जोर-जोर से चीखने लगी।


पूरा सुरंग कांप उठा।


दीवारों से मिट्टी गिरने लगी।


गुड्डू डर गया।


“वीर! यहां से निकलो!”


लेकिन वीर चिल्लाया—


“नहीं! अब सच छिपेगा नहीं!”


उसने जल्दी से डायरी और पायल उठाई।


फिर दोनों जान बचाकर सुरंग से बाहर भागने लगे।


पीछे से डरावनी चीखें लगातार गूंज रही थीं।


ऐसा लग रहा था जैसे पूरा कुआं टूट जाएगा।


किसी तरह दोनों बाहर निकल आए।


पूरा गांव वहां जमा था।


जैसे ही वीर ने डायरी और पायल दिखाई…

लोगों के चेहरों का रंग उड़ गया।


दाताराम बाबा कांपती आवाज में बोले—


“हे भगवान… ये सच था…”


उसी समय गांव में खबर फैल गई कि वीर को चंदा की लाश मिल गई है।


कुछ देर बाद पुलिस भी गांव पहुंच गई।


वीर ने डायरी पुलिस को दे दी।


पूरा गांव डर और शर्म में डूब चुका था।


अब किसी के पास सच छिपाने का रास्ता नहीं था।


उधर ठाकुर रणवीर सिंह को जब ये खबर मिली…

तो उसके होश उड़ गए।


उसने गांव छोड़कर भागने की कोशिश की।


लेकिन पुलिस ने उसे हवेली से ही गिरफ्तार कर लिया।


गांव वाले पहली बार ठाकुर को हथकड़ी में देखकर हैरान थे।


जिस आदमी से पूरा गांव डरता था…

आज वो सिर झुकाकर खड़ा था।


गिरफ्तारी के समय ठाकुर अचानक चिल्लाने लगा—


“वो मुझे छोड़ने नहीं आई! वो वापस आ गई है!”


लोग डर गए।


ठाकुर कांप रहा था।


उसकी आंखें कुएं की तरफ टिकी थीं।


और फिर अचानक…


सबने देखा।


कुएं के पास सफेद साड़ी में एक औरत खड़ी थी।


हवा तेज चलने लगी।

पेड़ जोर-जोर से हिलने लगे।


ठाकुर डर के मारे जमीन पर गिर पड़ा।


“मुझे माफ कर दो!”


लेकिन अगले ही पल…


चंदा की आत्मा धीरे-धीरे धुंध में बदलने लगी।


उसकी आंखों से इस बार काला पानी नहीं… आंसू बह रहे थे।


उसने आखिरी बार वीर की तरफ देखा।


जैसे धन्यवाद कह रही हो।


फिर वो हमेशा के लिए गायब हो गई।


अचानक पूरा माहौल शांत हो गया।


हवा रुक गई।

रोने की आवाज बंद हो गई।


और पहली बार…

उस पुराने कुएं के आसपास डर नहीं था।


कुछ दिनों बाद गांव वालों ने चंदा का अंतिम संस्कार पूरे सम्मान के साथ किया।


ठाकुर और उसके आदमी जेल भेज दिए गए।


गांव वालों को अपनी गलती का एहसास हो चुका था।


अगर उन्होंने 25 साल पहले सच बोल दिया होता…

तो शायद एक मासूम आत्मा को इतने साल भटकना ना पड़ता।


एक शाम वीर और गुड्डू उसी कुएं के पास खड़े थे।


सूरज धीरे-धीरे ढल रहा था।


अब वहां पहले जैसा डर नहीं था।


गुड्डू हल्का सा मुस्कुराया।


“लगता है… उसे आखिरकार इंसाफ मिल गया।”


वीर ने कुएं की तरफ देखा।


ठंडी हवा उसके चेहरे से टकराई।


और उसे ऐसा महसूस हुआ…

जैसे कहीं दूर से किसी लड़की की हल्की सी हंसी सुनाई दी हो।


लेकिन इस बार…

उस हंसी में दर्द नहीं था…

सुकून था

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