70 साल का दूल्हा

 



उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गाँव “रहमतपुर” में शाम धीरे-धीरे उतर रही थी। आसमान पर हल्का नारंगी रंग फैला हुआ था और मस्जिद की मीनारों से मग़रिब की अज़ान की आवाज़ पूरे गाँव में गूंज रही थी। मिट्टी के घरों के बीच से गुजरती ठंडी हवा में गेहूँ की फसल की खुशबू घुली हुई थी। गाँव के लोग अपने-अपने घरों की तरफ लौट रहे थे, लेकिन एक घर ऐसा था जहाँ आज अजीब सी बेचैनी पसरी हुई थी।


वह घर था हाजी सलीम का।


हाजी सलीम गाँव के गरीब लोगों में गिने जाते थे। उनके पास थोड़ा सा खेत था जिससे मुश्किल से घर चलता था। उनकी पत्नी का कई साल पहले इंतकाल हो चुका था। घर में बस उनकी इकलौती बेटी “आयशा” थी — 19 साल की, मासूम, बेहद खूबसूरत और अल्लाह से डरने वाली लड़की। आयशा पाँच वक्त की नमाज़ पढ़ती थी, कुरान शरीफ की तिलावत करती थी और गाँव की बाकी लड़कियों से बिल्कुल अलग थी। उसकी आँखों में हमेशा शर्म और सादगी दिखाई देती थी।


लेकिन पिछले कुछ महीनों से हाजी सलीम बहुत परेशान रहने लगे थे। उन पर कर्ज़ बढ़ता जा रहा था। खेत में फसल खराब हो गई थी। ऊपर से बीमारी ने उन्हें कमज़ोर कर दिया था। कई बार ऐसा होता कि घर में खाने तक के पैसे नहीं होते थे।


उस रात आयशा ने देखा कि उसके अब्बू चुपचाप आँगन में बैठे हुए हैं। उनके चेहरे पर गहरी चिंता थी। आयशा धीरे से उनके पास आई और बोली,


“अब्बू… क्या बात है? आप इतने परेशान क्यों हैं?”


हाजी सलीम ने उसकी तरफ देखा, लेकिन कुछ नहीं बोले। उनकी आँखें नम थीं।


“कुछ नहीं बेटी… बस वक्त खराब चल रहा है।”


आयशा उनके पास बैठ गई।


“अब्बू, अल्लाह पर भरोसा रखिए। अल्लाह हर मुश्किल आसान करता है।”


हाजी सलीम ने गहरी साँस ली। शायद वो कुछ कहना चाहते थे, लेकिन हिम्मत नहीं जुटा पा रहे थे।









अगले दिन सुबह गाँव में एक खबर आग की तरह फैल गई।


गाँव का सबसे अमीर आदमी “हाजी उस्मान” आयशा से शादी करना चाहता था।


हाजी उस्मान करीब 70 साल का बूढ़ा आदमी था। लंबी सफेद दाढ़ी, झुका हुआ शरीर, हाथ में हमेशा तस्बीह और आँखों में अजीब सा घमंड। उसकी तीन बीवियाँ पहले ही मर चुकी थीं। उसके बच्चे भी आयशा से बड़े थे। पूरे गाँव में लोग उससे डरते थे क्योंकि उसके पास बहुत दौलत थी।


जब यह खबर आयशा के कानों तक पहुँची, तो उसके पैरों तले जमीन खिसक गई।


“क्या…? मेरी शादी… हाजी उस्मान से?”


उसकी आवाज काँप रही थी।


वह भागकर अपने अब्बू के पास गई।


“अब्बू! ये लोग क्या कह रहे हैं?”


हाजी सलीम की आँखें झुक गईं।


“बेटी… मैंने बहुत कोशिश की… लेकिन हमारे पास कोई रास्ता नहीं बचा…”


आयशा की आँखों में आँसू भर आए।


“लेकिन अब्बू… वो तो बहुत बूढ़े हैं… मैं उनकी पोती की उम्र की हूँ…”


हाजी सलीम रो पड़े।


“मुझे माफ कर दो बेटी… उन्होंने हमारा सारा कर्ज़ माफ करने का वादा किया है… और कहा है कि तुम्हें किसी चीज़ की कमी नहीं होगी…”


आयशा का दिल टूट चुका था। उसने कभी सोचा भी नहीं था कि उसकी जिंदगी ऐसा मोड़ लेगी।


उस रात आयशा अपने कमरे में बैठी रोती रही। उसके हाथ में कुरान शरीफ था। वह बार-बार अल्लाह से दुआ कर रही थी।


“या अल्लाह… अगर इसमें मेरी भलाई है तो मुझे सब्र दे… और अगर इसमें बुराई है तो कोई रास्ता निकाल दे…”


उसकी आँखों से आँसू लगातार गिर रहे थे।


गाँव की औरतें अगले दिन से शादी की बातें करने लगीं। कुछ लोग अफसोस कर रहे थे, तो कुछ लोग सिर्फ तमाशा देख रहे थे।


एक बूढ़ी औरत दूसरी से बोली,


“बेचारी बच्ची… उसकी उम्र ही क्या है…”


दूसरी ने धीरे से कहा,


“गरीबी इंसान से सब कुछ करवा देती है…”


उधर हाजी उस्मान अपने बड़े हवेलीनुमा घर में बैठा मुस्कुरा रहा था। उसके सामने महंगे पकवान रखे थे। उसने अपने नौकर से कहा,


“निकाह जल्दी करवाओ। मुझे इंतजार पसंद नहीं।”


उसकी आवाज़ में अजीब सी सख्ती थी।


कुछ दिनों बाद निकाह की तारीख तय हो गई।


पूरा गाँव उस दिन को लेकर बातें कर रहा था।


निकाह वाले दिन आयशा को लाल रंग का भारी जोड़ा पहनाया गया। उसके हाथों में मेहंदी थी, लेकिन चेहरे पर खुशी का नाम तक नहीं था। उसकी सहेलियाँ उसे देख रही थीं, लेकिन किसी की हिम्मत नहीं हो रही थी कुछ कहने की।


आयशा आईने के सामने बैठी थी। उसकी आँखें सूज चुकी थीं रो-रोकर।


उसने धीरे से खुद से कहा,


“क्या यही मेरी किस्मत है…?”


बाहर मस्जिद में निकाह की तैयारी चल रही थी।


हाजी उस्मान सफेद शेरवानी पहनकर बैठा था। उसकी उम्र उसके चेहरे से साफ दिखाई दे रही थी। लोग उसे देखकर आपस में फुसफुसा रहे थे।


जब काजी साहब ने आयशा से निकाह के लिए पूछा, तो कुछ पल के लिए पूरा कमरा खामोश हो गया।


आयशा के होंठ काँप रहे थे।


उसकी आँखों से आँसू बह निकले।


उसने अपने अब्बू की तरफ देखा। हाजी सलीम सिर झुकाकर रो रहे थे।


आयशा ने काँपती आवाज़ में कहा—


“क… कबूल है…”


यह कहते ही ऐसा लगा जैसे उसकी सारी खुशियाँ उसी पल खत्म हो गई हों।


निकाह पूरा हो गया।


और उसी रात, आयशा की जिंदगी एक ऐसे अंधेरे सफर में दाखिल हो गई… जिसका दर्द अभी शुरू हुआ था निकाह के बाद की रात रहमतपुर गाँव में धीरे-धीरे सन्नाटा फैलने लगा था। दूर मस्जिद से ईशा की अज़ान की हल्की आवाज़ हवा में तैर रही थी। आसमान पर आधा चाँद चमक रहा था, लेकिन आयशा की जिंदगी में जैसे हर रोशनी बुझ चुकी थी।


हाजी उस्मान की बड़ी हवेली रंग-बिरंगी लाइटों से जगमगा रही थी। बाहर लोग खाना खा रहे थे, बातें कर रहे थे, लेकिन उस शोर के बीच एक दिल ऐसा था जो अंदर ही अंदर टूट चुका था।


आयशा।


वह भारी लाल जोड़े में चुपचाप बैठी थी। उसके हाथों की मेहंदी अभी भी गहरी थी, लेकिन आँखों में सिर्फ डर था। उसके चेहरे पर उदासी साफ दिखाई दे रही थी। कमरे में कुछ बूढ़ी औरतें बैठी थीं जो बार-बार उसे नसीहतें दे रही थीं।


“अब यही तुम्हारा घर है।”


“शौहर की बात मानना बीवी का फर्ज़ होता है।”


“औरत को सब्र करना चाहिए।”


हर बात आयशा के दिल में तीर की तरह लग रही थी।


थोड़ी देर बाद एक औरत ने धीरे से कहा,


“चलो बेटी… हाजी साहब के कमरे में जाना है।”


यह सुनते ही आयशा का दिल जोर-जोर से धड़कने लगा।


उसके कदम जैसे जम गए।


लेकिन किसी ने उसकी हालत समझने की कोशिश नहीं की।


दो औरतों ने उसे उठाया और हवेली के अंदर बने बड़े कमरे की तरफ ले जाने लगीं।


पूरा रास्ता संगमरमर से बना था। दीवारों पर महंगे पर्दे लगे थे। बड़े-बड़े झूमर चमक रहे थे। यह सब देखकर भी आयशा को कोई खुशी नहीं हुई। उसे अपना छोटा मिट्टी का घर याद आ रहा था… जहाँ गरीबी थी, लेकिन सुकून था।


जब वह कमरे के दरवाजे तक पहुँची, तो उसके हाथ काँपने लगे।


दरवाजा धीरे से खोला गया।


कमरे में हल्की इत्र की खुशबू फैली हुई थी। बीच में बड़ा सा पलंग था जिस पर सफेद चादर बिछी हुई थी। कमरे के एक कोने में हाजी उस्मान बैठे तस्बीह पढ़ रहे थे।


उनकी लंबी सफेद दाढ़ी और बूढ़ा चेहरा देखकर आयशा की आँखें नीचे झुक गईं।


दरवाजा बंद हो गया।
















अब कमरे में सिर्फ दो लोग थे।


आयशा और उसका 70 साल का शौहर।


कुछ पल तक खामोशी छाई रही।


फिर हाजी उस्मान ने धीमी आवाज़ में कहा,


“बैठ जाओ।”


आयशा धीरे से पलंग के कोने पर बैठ गई।


उसके हाथ काँप रहे थे।


हाजी उस्मान उसे लगातार देख रहे थे।


“तुम बहुत खूबसूरत हो…”


यह सुनकर आयशा को और असहज महसूस हुआ।


उसने नजरें झुका लीं।


हाजी उस्मान धीरे-धीरे उसके करीब आए।


आयशा का दिल डर से सिकुड़ने लगा।


लेकिन तभी बाहर अचानक तेज हवा चलने लगी। खिड़की जोर से हिलने लगी। उसी वक्त मस्जिद से कुरान की तिलावत की आवाज़ आने लगी।


आयशा की आँखों से आँसू निकल पड़े।


उसने काँपती आवाज़ में कहा,


“मुझे डर लग रहा है…”


हाजी उस्मान कुछ पल चुप रहे।


फिर बोले,


“डरने की जरूरत नहीं। अब तुम मेरी बीवी हो।”


लेकिन यह बात आयशा के दिल को बिल्कुल सुकून नहीं दे सकी।


उस रात वह पूरी रात सो नहीं पाई।


सुबह फज्र की अज़ान हुई तो आयशा सबसे पहले उठी। उसने वुज़ू किया और नमाज़ पढ़ने लगी। सजदे में जाते ही उसकी आँखों से आँसू बहने लगे।


“या अल्लाह… मुझे हिम्मत दे…”


नमाज़ के बाद वह हवेली के आँगन में गई।


वहाँ नौकर-चाकर काम कर रहे थे। बड़ी-बड़ी दीवारें, महंगे फर्नीचर, हर तरफ दौलत दिखाई देती थी… लेकिन उस हवेली में अपनापन नहीं था।


उसी समय एक औरत उसके सामने आई।


वह करीब 45 साल की थी। चेहरे पर घमंड साफ दिखाई दे रहा था।


उसने आयशा को ऊपर से नीचे तक देखा।


“तो तुम नई दुल्हन हो?”


आयशा ने धीरे से सिर हिलाया।


औरत ने ताना मारते हुए कहा,


“मैं रुकैय्या हूँ… हाजी साहब की बड़ी बहू।”


आयशा ने सलाम किया।


लेकिन रुकैय्या ने जवाब तक नहीं दिया।


वह गुस्से से बोली,


“तुम्हारी वजह से पूरे गाँव में लोग बातें बना रहे हैं। अब्बू की उम्र देखी है तुमने?”


आयशा की आँखें भर आईं।


“मैंने ये शादी अपनी खुशी से नहीं की…”


रुकैय्या हँस पड़ी।


“खुशी से कौन करता है ऐसी शादी?”


इतना कहकर वह चली गई।


आयशा वहीं खड़ी रह गई।


उसका दिल और टूट चुका था।


कुछ दिनों में उसे एहसास होने लगा कि हवेली के लोग उसे पसंद नहीं करते।


हाजी उस्मान के बेटे उससे नफरत करते थे क्योंकि उन्हें लगता था कि आयशा सिर्फ दौलत के लिए आई है।


बहुएँ उसे ताने मारती थीं।


नौकर भी उसका सम्मान नहीं करते थे।


एक दिन दोपहर को आयशा रसोई में काम कर रही थी। तभी हाजी उस्मान का बड़ा बेटा “इमरान” अंदर आया।


उसकी उम्र लगभग 40 साल थी।


उसने गुस्से से कहा,


“तुमने मेरे बूढ़े बाप को अपने जाल में फँसा लिया!”


आयशा घबरा गई।


“नहीं… मैंने कुछ नहीं किया…”


इमरान ने मेज पर हाथ मारा।


“झूठ मत बोलो!”


इतने में हाजी उस्मान वहाँ आ गए।


उन्होंने गुस्से में कहा,


“इमरान! अपनी हद में रहो!”


इमरान गुस्से से बाहर चला गया, लेकिन जाते-जाते बोला,


“ये लड़की इस घर को बर्बाद कर देगी…”


उस दिन के बाद हवेली का माहौल और खराब हो गया।


आयशा हर रात रोते-रोते सोती।


उसे अपना पुराना घर याद आता।


अपने अब्बू याद आते।


लेकिन अब वापसी का कोई रास्ता नहीं था।


एक रात वह छत पर खड़ी आसमान को देख रही थी। ठंडी हवा चल रही थी।


उसने धीरे से दुआ माँगी—


“या अल्लाह… अगर मेरी जिंदगी में कोई खुशी बाकी है… तो मुझे जरूर दिखाना…”


उसी वक्त नीचे हवेली के बाहर एक अजनबी नौजवान घोड़े से उतर रहा था।


उसने सफेद कुर्ता पहना हुआ था, चेहरे पर हल्की दाढ़ी थी और आँखों में अजीब सी गंभीरता।


नौकर उसे अंदर ले जा रहे थे।


आयशा ने उसे दूर से देखा… लेकिन उसे नहीं पता था कि यह अजनबी उसकी जिंदगी को हमेशा के लिए बदलने वाला था रहमतपुर गाँव में उस रात हल्की ठंडक थी। आसमान बादलों से घिरा हुआ था और दूर कहीं बिजली चमक रही थी। हवेली के बाहर बड़े-बड़े पेड़ों की शाखाएँ हवा से हिल रही थीं। पूरा माहौल अजीब सा डर और बेचैनी पैदा कर रहा था।


हाजी उस्मान की हवेली के अंदर सब लोग खाने की तैयारी में लगे हुए थे। नौकर इधर-उधर भाग रहे थे। बड़े से दालान में रोशनी जगमगा रही थी। लेकिन हवेली के एक कोने में खड़ी आयशा की आँखों में वही उदासी थी जो निकाह वाले दिन थी।


वह छत से नीचे आ रही थी, तभी उसने देखा कि वही अजनबी नौजवान हॉल में बैठा हुआ है। हाजी उस्मान खुद उसके सामने बैठे थे।


आयशा धीरे से सीढ़ियों के पीछे रुक गई।


वह नौजवान करीब 28 साल का था। चेहरे पर सादगी थी। सफेद कुर्ता-पायजामा पहने हुए था। उसकी आँखों में अजीब सा सुकून था। बाकी अमीर लोगों की तरह उसके चेहरे पर घमंड नहीं था।


हाजी उस्मान मुस्कुराकर बोले,


“अरे बेटा फ़ैज़ान, इतने साल बाद याद आई हमारी?”


तो उसका नाम फ़ैज़ान था।


फ़ैज़ान ने अदब से जवाब दिया,


“चचा जान, दिल्ली में काम बहुत था। अब कुछ दिन आपके पास रहूँगा।”


उसकी आवाज़ बेहद नरम थी।


आयशा चुपचाप सुन रही थी।


इतने में रुकैय्या ने आयशा को देख लिया।


“यहाँ क्या कर रही हो? जाओ अंदर!”


आयशा डरकर तुरंत चली गई।


लेकिन उसके दिल में पहली बार किसी इंसान को देखकर डर नहीं, बल्कि थोड़ी राहत महसूस हुई थी।


अगले दिन सुबह हवेली में हलचल थी। फ़ैज़ान आँगन में बैठे कुरान शरीफ पढ़ रहे थे। उनकी आवाज़ बहुत प्यारी थी। हवेली के नौकर भी चुपचाप सुन रहे थे।


आयशा रसोई से पानी लेने आई थी। जैसे ही उसने फ़ैज़ान की तिलावत सुनी, वह कुछ पल के लिए वहीं रुक गई।


उसे ऐसा लगा जैसे लंबे समय बाद उसके दिल को थोड़ी शांति मिली हो।


उसी समय फ़ैज़ान की नजर आयशा पर पड़ी।


आयशा घबरा गई और तुरंत नजरें झुका लीं।


फ़ैज़ान ने बहुत अदब से सलाम किया,


“अस्सलामु अलैकुम।”


आयशा ने धीरे से जवाब दिया,


“वालेकुम अस्सलाम…”


और जल्दी से वहाँ से चली गई।


लेकिन उस छोटे से पल ने उसके दिल में अजीब सी हलचल पैदा कर दी।


उस दिन दोपहर में हवेली के बाहर बारिश शुरू हो गई। काले बादल पूरे आसमान पर छा गए। तेज हवाओं के साथ बारिश की बूंदें आँगन में गिरने लगीं।


आयशा खिड़की के पास खड़ी बारिश देख रही थी।


उसे अपना बचपन याद आने लगा… कैसे वह अपने पुराने घर के बाहर बारिश में भीगती थी… उसकी अम्मी हँसते हुए उसे अंदर बुलाती थीं…


यह सोचते ही उसकी आँखें भर आईं।


तभी पीछे से आवाज़ आई,


“आप रो रही हैं?”


आयशा ने पीछे मुड़कर देखा।


फ़ैज़ान खड़े थे।


आयशा तुरंत अपने आँसू छिपाने लगी।


“न… नहीं।”


फ़ैज़ान कुछ पल चुप रहे।


फिर धीरे से बोले,


“कभी-कभी इंसान की आँखें वो सच बता देती हैं… जो ज़ुबान नहीं कह पाती।”


यह सुनकर आयशा की आँखें फिर भर आईं।


लेकिन उसने कुछ नहीं कहा।


फ़ैज़ान ने नजरें झुका लीं।


“माफ कीजिए… मेरा मकसद आपको दुख देना नहीं था।”


आयशा पहली बार किसी को देखकर थोड़ा सहज महसूस कर रही थी।


उसने धीमी आवाज़ में पूछा,


“आप… हाजी साहब के रिश्तेदार हैं?”


“जी। वो मेरे दूर के चचा जान हैं।”


“आप दिल्ली में क्या करते हैं?”


“मैं बच्चों को दीन की तालीम देता हूँ… एक मदरसे में।”


यह सुनकर आयशा हैरान रह गई।


उसे लगा था कि हवेली में आने वाले सारे लोग सिर्फ दौलत और दिखावे वाले होंगे।


लेकिन फ़ैज़ान अलग थे।


उनकी बातें बहुत सादगी भरी थीं।


तभी अचानक पीछे से रुकैय्या की आवाज़ आई,


“आयशा!”


दोनों तुरंत अलग हो गए।


रुकैय्या गुस्से से आयशा को देखने लगी।


“तुम यहाँ क्या कर रही हो?”


“मैं… बस…”


रुकैय्या ने शक भरी नजरों से फ़ैज़ान को देखा।


फिर आयशा से बोली,


“घर की औरतों को गैर-मर्दों से ज्यादा बातें करना अच्छा नहीं लगता।”


आयशा चुपचाप सिर झुकाकर चली गई।


लेकिन रुकैय्या के चेहरे पर शक साफ दिखाई दे रहा था।


उस रात आयशा अपने कमरे में बैठी थी। बाहर बारिश अभी भी हो रही थी।


उसके कानों में बार-बार फ़ैज़ान की बातें गूंज रही थीं।


“कभी-कभी इंसान की आँखें वो सच बता देती हैं…”


आयशा खुद को समझाने लगी,


“नहीं… मुझे ऐसा नहीं सोचना चाहिए… मैं शादीशुदा हूँ…”


लेकिन दिल बार-बार उसी तरफ जा रहा था।


दूसरी तरफ फ़ैज़ान भी बेचैन थे।


उन्होंने हाजी उस्मान से आयशा के बारे में सब सुन लिया था।


उन्हें अंदर से बहुत दुख हो रहा था।


रात को जब सब सो गए, तो फ़ैज़ान हवेली के बाहर बने छोटे बगीचे में चले गए। हल्की बारिश अब भी हो रही थी।


उन्होंने आसमान की तरफ देखा और धीरे से कहा,


“या अल्लाह… उस लड़की की जिंदगी में इतना दर्द क्यों लिखा…”


उन्हें पहली बार किसी के लिए इतना दुख महसूस हो रहा था।


अगले कुछ दिनों में फ़ैज़ान और आयशा की छोटी-छोटी मुलाकातें होने लगीं।


कभी आँगन में…


कभी रसोई के पास…


कभी मस्जिद जाते वक्त…


दोनों हमेशा अदब और दूरी बनाए रखते, लेकिन फिर भी उनके दिलों में एक अजीब सा रिश्ता बनने लगा था।


एक दिन शाम को आयशा हवेली के पीछे वाले पुराने कुएँ के पास बैठी रो रही थी।


फ़ैज़ान वहाँ से गुजरे तो रुक गए।


“क्या हुआ?”


आयशा ने आँसू पोंछे।


“कुछ नहीं…”


“अगर दिल में दर्द दबा रहेगी… तो और ज्यादा तकलीफ होगी।”


आयशा टूट गई।


उसने पहली बार अपने दिल की बात कही।


“मैंने कभी ये जिंदगी नहीं चाही थी… मैं बस अपने अब्बू की मजबूरी बन गई…”


उसकी आवाज़ काँप रही थी।


फ़ैज़ान चुपचाप सुनते रहे।


फिर बोले,


“अल्लाह किसी इंसान पर उसकी ताकत से ज्यादा बोझ नहीं डालता।”


यह सुनकर आयशा रो पड़ी।


उसे पहली बार लगा कि कोई उसके दर्द को समझ रहा है।


लेकिन उसी समय हवेली की ऊपर वाली खिड़की से कोई उन्हें देख रहा था।


वह था — इमरान।


उसकी आँखों में गुस्सा भर चुका था।


उसने दाँत पीसते हुए कहा,


“मुझे पहले से शक था…”


और उसी पल उसने तय कर लिया कि वह आयशा की जिंदगी को और भी मुश्किल बना देगा रहमतपुर गाँव में सुबह का वक्त था। मस्जिद से फज्र की अज़ान की आवाज़ पूरे माहौल में गूंज रही थी। हल्की ठंडी हवा खेतों से गुजरती हुई हवेली तक आ रही थी। आसमान पर हल्का नीला रंग फैल चुका था और सूरज धीरे-धीरे निकल रहा था।


लेकिन हाजी उस्मान की हवेली के अंदर एक तूफ़ान जन्म ले चुका था।


इमरान पूरी रात सो नहीं पाया था। उसके दिमाग में बार-बार वही मंज़र घूम रहा था — आयशा और फ़ैज़ान कुएँ के पास बात कर रहे थे।


हालाँकि दोनों के बीच कोई गलत बात नहीं हुई थी, लेकिन इमरान के दिल में पहले से ही आयशा के लिए नफरत भरी हुई थी। उसे लगता था कि यह लड़की एक दिन उनके घर को बर्बाद कर देगी।


सुबह होते ही वह गुस्से में सीधे अपने बाप हाजी उस्मान के कमरे में पहुँचा।


हाजी उस्मान तस्बीह पढ़ रहे थे।


इमरान ने बिना सलाम किए कहा,


“अब्बू! मैंने आपको पहले ही कहा था कि इस लड़की को घर में लाना गलती है!”


हाजी उस्मान ने नाराज़ होकर उसकी तरफ देखा।


“बदतमीज़! पहले सलाम करो!”


लेकिन इमरान गुस्से में काँप रहा था।


“आपको पता भी है वो क्या कर रही है?”


हाजी उस्मान की भौंहें सिकुड़ गईं।


“साफ-साफ बोलो।”


इमरान ने दाँत भींचकर कहा,


“वो फ़ैज़ान से छुप-छुपकर मिल रही है!”


यह सुनते ही कमरे में सन्नाटा छा गया।


हाजी उस्मान कुछ पल तक इमरान को देखते रहे।


फिर अचानक गुस्से से खड़े हो गए।


“ज़ुबान संभालकर बात करो!”


इमरान चिल्लाया,


“मैंने अपनी आँखों से देखा है!”


हाजी उस्मान के चेहरे पर गुस्सा और बेचैनी दोनों दिखाई देने लगे।


उन्हें यकीन नहीं हो रहा था।


लेकिन उनके दिल में शक का छोटा सा बीज पड़ चुका था।


उधर आयशा अपने कमरे में नमाज़ पढ़ रही थी। उसे बिल्कुल अंदाज़ा नहीं था कि हवेली में उसके खिलाफ कैसी बातें शुरू हो चुकी हैं।


नमाज़ खत्म करके उसने दुआ माँगी—


“या अल्लाह… मेरे दिल को सुकून दे…”


तभी अचानक कमरे का दरवाजा जोर से खुला।


आयशा डर गई।


सामने हाजी उस्मान खड़े थे।


उनकी आँखों में गुस्सा साफ दिखाई दे रहा था।


“मुझे तुमसे बात करनी है।”


आयशा घबरा गई।


“जी…”


हाजी उस्मान धीरे-धीरे उसके करीब आए।


“तुम्हारा फ़ैज़ान से क्या रिश्ता है?”


यह सुनते ही आयशा का चेहरा सफेद पड़ गया।


“जी…? कुछ भी नहीं…”


“झूठ मत बोलो!”


उनकी आवाज़ इतनी तेज थी कि आयशा काँप उठी।


“इमरान ने सब देखा है!”


आयशा की आँखों में आँसू भर आए।


“हमने कुछ गलत नहीं किया… वो सिर्फ मेरी तकलीफ सुन रहे थे…”


हाजी उस्मान गुस्से में बोले,


“तुम मेरी इज़्ज़त मिट्टी में मिलाना चाहती हो?”


“नहीं! खुदा की कसम नहीं!”


आयशा रोने लगी।


लेकिन उस वक्त हाजी उस्मान का दिल गुस्से से भरा हुआ था।


उन्होंने पहली बार आयशा पर शक किया था।


और शक इंसान की सोच को अंधा बना देता है।


उसी समय बाहर पूरे घर में बातें फैलने लगीं।


रुकैय्या दूसरी बहुओं से कह रही थी,


“मैंने पहले ही कहा था… ये लड़की ठीक नहीं है।”


एक और औरत बोली,


“बूढ़े आदमी की जवान बीवी… यही होना था।”


हवेली का हर कोना अब फुसफुसाहटों से भर गया था।


आयशा अपने कमरे में अकेली बैठी रो रही थी।


उसे लग रहा था जैसे उसकी पूरी दुनिया खत्म हो रही है।


उसने खुद से कहा,


“या अल्लाह… मैंने कोई गुनाह नहीं किया…”


लेकिन उसके आँसू रुक नहीं रहे थे।


दूसरी तरफ फ़ैज़ान को भी सब पता चल चुका था।


वह सीधे हाजी उस्मान के पास गए।


“चचा जान, मुझे आपसे बात करनी है।”


हाजी उस्मान ने गुस्से से उनकी तरफ देखा।


“अब क्या सफाई दोगे?”


फ़ैज़ान हैरान रह गए।


“सफाई? मैंने क्या किया है?”


इमरान बीच में बोल पड़ा,


“मासूम बनने की जरूरत नहीं!”


फ़ैज़ान समझ गए कि मामला बहुत बिगड़ चुका है।


उन्होंने शांत आवाज़ में कहा,


“मैंने कभी कोई गलत इरादा नहीं रखा। आयशा बीबी सिर्फ दुखी थीं… मैं उन्हें सब्र की बातें समझा रहा था।”


लेकिन इमरान हँस पड़ा।


“वाह! अब गैर औरतों को तसल्ली देना भी नेक काम हो गया?”


फ़ैज़ान ने गुस्से को दबाया।


“आप गलत सोच रहे हैं।”


हाजी उस्मान चुपचाप सब सुन रहे थे।


उनके दिल में अजीब सी लड़ाई चल रही थी।


एक तरफ उन्हें फ़ैज़ान की अच्छाई पर भरोसा था।


दूसरी तरफ समाज का डर था।


लोग क्या कहेंगे…?


एक बूढ़े आदमी की जवान बीवी और एक नौजवान…


यह सोचकर उनका दिल जलने लगा।


उस रात हवेली का माहौल बहुत भारी था।


किसी ने ठीक से खाना तक नहीं खाया।


आयशा अपने कमरे में अकेली बैठी थी।


तभी बाहर तेज बारिश शुरू हो गई।


बिजली कड़कने लगी।


अचानक दरवाजे पर हल्की दस्तक हुई।


आयशा डर गई।


“कौन?”


बाहर से आवाज़ आई,


“मैं हूँ… फ़ैज़ान।”


आयशा घबरा गई।


“आप यहाँ क्यों आए हैं? अगर किसी ने देख लिया तो…”


फ़ैज़ान की आवाज़ दुखी थी।


“मैं सिर्फ ये कहने आया हूँ कि आप परेशान मत होइए। मैंने चचा जान को सब सच बता दिया है।”


आयशा की आँखों से आँसू बह निकले।


“सब मेरी वजह से हुआ…”


“नहीं। गलती आपकी नहीं… लोगों की सोच की है।”


कुछ पल दोनों चुप रहे।


बारिश की आवाज़ पूरे माहौल में गूंज रही थी।


फिर फ़ैज़ान ने धीरे से कहा,


“आप बहुत पाक दिल इंसान हैं… अल्लाह सब देख रहा है।”


आयशा रो पड़ी।


उसे जिंदगी में पहली बार किसी की बातों में सच्ची हमदर्दी महसूस हो रही थी।


लेकिन उसी समय गलियारे में किसी के कदमों की आवाज़ आई।


दोनों घबरा गए।


अचानक दरवाजा खुला।


सामने हाजी उस्मान खड़े थे।


उनकी आँखों में आग थी।


उन्होंने फ़ैज़ान को आयशा के कमरे के बाहर खड़े देख लिया था।


कुछ पल के लिए पूरा माहौल जम गया।


फिर हाजी उस्मान जोर से चिल्लाए—


“दफा हो जाओ मेरी नजरों से!!!”


उनकी आवाज़ इतनी भयानक थी कि पूरा घर काँप उठा।


नौकर, बहुएँ, बच्चे — सब बाहर निकल आए।


आयशा डर के मारे काँप रही थी।


फ़ैज़ान ने समझाने की कोशिश की—


“चचा जान, आप गलत समझ रहे हैं—”


लेकिन हाजी उस्मान ने गुस्से में उनका कॉलर पकड़ लिया।


“मैंने तुम्हें बेटे की तरह माना… और तुमने यही किया?”


फ़ैज़ान की आँखों में दर्द था।


“खुदा गवाह है… मैंने कोई गुनाह नहीं किया…”


लेकिन उस वक्त कोई उनकी बात सुनने को तैयार नहीं था।


आयशा जोर-जोर से रो रही थी।


“हम बेकसूर हैं…”


लेकिन हवेली में अब सिर्फ इल्ज़ामों का शोर था।


और उसी रात…


हाजी उस्मान ने गुस्से में एक ऐसा फैसला लिया… जिसने आयशा की जिंदगी को पूरी तरह बदलने वाला था रहमतपुर गाँव की वह रात बहुत भारी थी। आसमान पर काले बादल छाए हुए थे। तेज हवाएँ चल रही थीं। हवेली के बाहर लगे पुराने पेड़ जोर-जोर से हिल रहे थे, जैसे आने वाले तूफ़ान का इशारा दे रहे हों।


हाजी उस्मान की हवेली के अंदर हर तरफ तनाव फैला हुआ था।


आँगन में पूरे घर वाले जमा थे। नौकर भी सहमे हुए खड़े थे। कोई खुलकर कुछ नहीं बोल रहा था, लेकिन सबकी नजरें आयशा और फ़ैज़ान पर टिकी हुई थीं।


आयशा रोते हुए एक कोने में खड़ी थी।


उसका दुपट्टा आँसुओं से भीग चुका था।


फ़ैज़ान चुपचाप सिर झुकाए खड़े थे।


और सामने गुस्से से काँपते हुए हाजी उस्मान।


उनकी आँखें लाल हो चुकी थीं। हाथ में तस्बीह थी, लेकिन दिल में आग भरी हुई थी।


इमरान बार-बार भड़काने वाली बातें कर रहा था।


“अब्बू! अब भी आपको सबूत चाहिए?”


“मैंने कहा था ना… ये लड़की हमारे खानदान की इज़्ज़त मिट्टी में मिला देगी!”


रुकैय्या भी बीच में बोल पड़ी,


“पूरे गाँव में लोग बातें करेंगे!”


“इस उम्र में निकाह करके क्या मिला आपको?”


हर शब्द हाजी उस्मान के गुस्से को और बढ़ा रहा था।


आयशा रोते हुए बोली,


“खुदा के लिए हमारी बात सुन लीजिए… हमने कोई गलत काम नहीं किया…”


लेकिन उस वक्त कोई उसकी सच्चाई सुनना नहीं चाहता था।


फ़ैज़ान आगे बढ़े।


“चचा जान, मैं कसम खाकर कहता हूँ—”


“चुप!!!”


हाजी उस्मान इतनी जोर से चिल्लाए कि पूरा आँगन काँप उठा।


उनकी साँसें तेज चल रही थीं।


उन्होंने काँपती उंगली से फ़ैज़ान की तरफ इशारा किया।


“आज के बाद इस हवेली में कदम मत रखना!”


फ़ैज़ान की आँखें भर आईं।


“अगर आप यही चाहते हैं… तो मैं चला जाऊँगा। लेकिन जाने से पहले सिर्फ इतना कहूँगा कि आयशा बीबी पाक दामन हैं।”


इमरान हँस पड़ा।


“वाह! कितनी फिक्र है तुम्हें उनकी!”


यह सुनकर फ़ैज़ान की आँखों में पहली बार गुस्सा दिखाई दिया।


“किसी की इज़्ज़त पर झूठा इल्ज़ाम लगाना बहुत बड़ा गुनाह है।”


लेकिन इमरान पर कोई असर नहीं हुआ।


उधर आयशा लगातार रो रही थी।


उसने हाजी उस्मान के सामने हाथ जोड़ दिए।


“मुझे गलत मत समझिए… मैंने हमेशा आपको अपना शौहर मानकर इज़्ज़त दी है…”


कुछ पल के लिए हाजी उस्मान की आँखों में नरमी आई।


लेकिन तभी बाहर कुछ गाँव वाले भी हवेली के दरवाजे पर जमा होने लगे।


लोग कानाफूसी कर रहे थे।


“लगता है हवेली में बड़ा झगड़ा हुआ है…”


“कहा था ना जवान लड़की से निकाह मत करो…”


यह बातें हाजी उस्मान के कानों तक पहुँच रही थीं।


उनका घमंड और समाज का डर मिलकर उनके दिल को पत्थर बना रहा था।


उन्होंने अचानक गुस्से में आयशा की तरफ देखा।


“तुमने मुझे लोगों के सामने शर्मिंदा कर दिया!”


आयशा रो पड़ी।


“नहीं… ऐसा मत कहिए…”


लेकिन हाजी उस्मान अब अपने गुस्से पर काबू खो चुके थे।


उन्होंने काँपती आवाज़ में कहा—


“आज से… मेरा और तुम्हारा कोई रिश्ता नहीं…”


आयशा की साँस जैसे रुक गई।


पूरा आँगन खामोश हो गया।


फिर अगले ही पल…


हाजी उस्मान ने गुस्से में वो तीन लफ़्ज़ कह दिए… जिन्होंने सब कुछ खत्म कर दिया—


“तलाक… तलाक… तलाक!”


यह सुनते ही आयशा की चीख निकल गई।


उसके पैरों तले जमीन खिसक गई।


वह रोते हुए वहीं गिर पड़ी।


पूरा हवेली सन्नाटे में डूब गई।


फ़ैज़ान भी सदमे में खड़े रह गए।


उन्हें यकीन नहीं हो रहा था कि गुस्से में इतना बड़ा फैसला ले लिया गया।


बारिश बाहर और तेज हो चुकी थी।


आयशा जमीन पर बैठी काँप रही थी।


उसकी आँखें सुन्न हो चुकी थीं।


वह बस बार-बार एक ही बात कह रही थी—


“मैंने कुछ नहीं किया…”


लेकिन अब बहुत देर हो चुकी थी।


हाजी उस्मान गुस्से में अपने कमरे में चले गए।


इमरान के चेहरे पर अजीब सी जीत दिखाई दे रही थी।


रुकैय्या धीरे से बोली,


“अब यही होना था…”


लेकिन फ़ैज़ान का दिल टूट चुका था।


उन्होंने आयशा को उस हालत में देखा तो उनकी आँखों से आँसू निकल पड़े।


वह उसके पास आए।


“खुद को संभालिए…”


आयशा रोते हुए बोली,


“मेरी जिंदगी खत्म हो गई…”


फ़ैज़ान कुछ नहीं कह पाए।


क्योंकि सच में… उस पल आयशा की दुनिया उजड़ चुकी थी।


कुछ देर बाद हवेली के नौकरों ने आयशा का सामान बाहर रख दिया।


बस एक छोटा सा बैग…


कुछ कपड़े…


और उसकी टूटी हुई जिंदगी।


आधी रात हो चुकी थी।


बारिश अब भी जारी थी।


आयशा धीरे-धीरे हवेली के बाहर निकली।


उसके कदम लड़खड़ा रहे थे।


पूरा गाँव उसे देख रहा था।


कुछ लोग अफसोस कर रहे थे।


कुछ सिर्फ तमाशा देख रहे थे।


लेकिन किसी ने आगे बढ़कर उसका दर्द कम नहीं किया।


आयशा सड़क पर अकेली चल रही थी।


बारिश उसके कपड़ों को भिगो चुकी थी।


उसकी आँखों में आँसू और आसमान से गिरती बारिश एक साथ मिल गए थे।


उसे समझ नहीं आ रहा था कि अब कहाँ जाए…


तभी पीछे से किसी ने आवाज़ दी—


“आयशा बीबी… रुक जाइए!”


आयशा ने पीछे मुड़कर देखा।


वह फ़ैज़ान थे।


बारिश में भीगे हुए… तेज साँस लेते हुए।


उन्होंने धीरे से कहा,


“आप इस हालत में अकेली कहीं नहीं जाएँगी।”


आयशा रोते हुए बोली,


“अब मेरा कोई घर नहीं रहा…”


फ़ैज़ान की आँखें भर आईं।


उन्होंने आसमान की तरफ देखा… फिर बहुत धीरे से कहा—


“अगर दुनिया सारे दरवाजे बंद कर दे… तब भी अल्लाह एक रास्ता जरूर खोलता है…”


आयशा चुपचाप उन्हें देखती रही।


उस रात रहमतपुर की सुनसान सड़क पर…


दो टूटे हुए इंसान खड़े थे…


और दोनों को बिल्कुल अंदाज़ा नहीं था कि आने वाला वक्त उनकी जिंदगी में कितना बड़ा इम्तिहान लेकर आने वाला है 

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