रिक्शेवाले से हुआ प्यार
उत्तर प्रदेश के एक छोटे शहर “माधवपुर” में करण नाम का एक गरीब लड़का रहता था।
वो दिनभर रिक्शा चलाकर अपना पेट पालता था।
सुबह से रात तक वह लोगों को स्टेशन, बाजार और अस्पताल छोड़ता रहता।
धूप हो या बारिश… करण कभी काम से पीछे नहीं हटता था।
उसका सपना बहुत छोटा था—
“बस एक दिन अपना छोटा-सा घर बनाऊँ… और अम्मा को आराम दूँ।”
करण की माँ बीमार रहती थीं।
हर महीने दवाइयों के लिए पैसे जुटाना उसके लिए सबसे बड़ी लड़ाई थी।
कई रातें ऐसी होतीं…
जब करण खुद भूखा सो जाता, लेकिन माँ की दवाई जरूर लाता।
पूरा शहर उसे मेहनती लड़के के नाम से जानता था।
लेकिन गरीब होने की वजह से लोग उसकी इज़्ज़त नहीं करते थे।
“अरे हट रिक्शेवाले!”
“सड़क तेरे बाप की है क्या?”
लोग अक्सर उसे डाँट देते, लेकिन करण हमेशा चुप रहता।
एक रात बहुत तेज बारिश हो रही थी।
सड़कें लगभग खाली थीं।
ठंडी हवा चल रही थी और बिजली बार-बार चमक रही थी।
करण स्टेशन के बाहर खड़ा सवारी का इंतज़ार कर रहा था।
तभी अचानक उसने देखा—
एक लड़की बारिश में भागती हुई उसकी तरफ आ रही थी।
लड़की पूरी तरह भीग चुकी थी।
महँगे कपड़े, हाथ में टूटा हुआ फोन और चेहरे पर डर साफ दिखाई दे रहा था।
वो सीधे करण के रिक्शे के पास आकर बोली—
“भैया जल्दी चलिए… कुछ लोग मेरा पीछा कर रहे हैं!”
करण ने पीछे देखा।
तीन लड़के तेज़ी से उनकी तरफ आ रहे थे।
उनके चेहरे देखकर ही पता चल रहा था कि उनका इरादा ठीक नहीं है।
करण तुरंत समझ गया कि मामला गंभीर है।
उसने बिना कुछ पूछे लड़की को रिक्शे में बैठाया और पूरी ताकत से पैडल मारने लगा।
पीछे से लड़के चिल्ला रहे थे—
“ए रिक्शेवाले! रोक उसको!”
बारिश और तेज हो चुकी थी।
सड़क पर पानी भरा था।
लेकिन करण लगातार रिक्शा चलाता रहा।
कुछ देर बाद वो लोग पीछे छूट गए।
लड़की डर के मारे काँप रही थी।
करण ने धीरे से पूछा—
“अब कहाँ जाना है?”
लड़की की आँखों में आँसू थे।
“मेरे पास जाने की कोई जगह नहीं है…”
करण हैरान रह गया।
इतनी अमीर दिखने वाली लड़की…
और जाने के लिए कोई जगह नहीं?
कुछ देर चुप रहने के बाद लड़की बोली—
“मेरा नाम निशा है…”
“आज मेरे पापा मेरी जबरदस्ती शादी करवाना चाहते थे… इसलिए मैं घर से भाग आई।”
करण कुछ पल शांत रहा।
फिर बोला—
“लेकिन रात में अकेले निकलना बहुत खतरनाक है।”
निशा रोते हुए बोली—
“अगर घर गई… तो मेरी जिंदगी खत्म हो जाएगी…”
करण समझ नहीं पा रहा था क्या करे।
उसके पास खुद रहने के लिए छोटा-सा टूटा घर था।
लेकिन वो एक अकेली लड़की को इस हालत में सड़क पर भी नहीं छोड़ सकता था।
कुछ देर सोचने के बाद उसने धीरे से कहा—
“अगर आपको भरोसा हो… तो आज रात आप मेरे घर रुक सकती हैं।”
निशा ने पहली बार करण की तरफ ध्यान से देखा।
भीगे हुए कपड़े…
थका हुआ चेहरा…
गरीब रिक्शेवाला…
लेकिन आँखों में सच्चाई साफ दिखाई दे रही थी।
निशा ने धीरे से सिर हिला दिया।
कुछ देर बाद करण उसे अपने छोटे-से घर ले आया।
घर देखकर निशा की आँखें भर आईं।
कच्ची दीवारें…
छोटी-सी रसोई…
और कोने में खाँसती हुई करण की बूढ़ी माँ।
अम्मा ने निशा को देखा और मुस्कुराईं—
“बेटा… ये कौन है?”
करण झिझकते हुए बोला—
“अम्मा… रास्ते में अकेली मिली थीं… रातभर यहीं रहेंगी।”
अम्मा सब समझ गईं।
उन्होंने तुरंत निशा को सूखे कपड़े दिए।
इतने प्यार की उम्मीद निशा ने शायद कभी नहीं की थी।
उस रात पहली बार उसने महसूस किया—
गरीब घर छोटे जरूर होते हैं…
लेकिन दिल बहुत बड़े होते हैं।
लेकिन उसी समय…
निशा के पिता “सेठ रणवीर मल्होत्रा” पूरे शहर में अपनी बेटी को ढूँढ रहे थे।
और जब उन्हें पता चला कि उनकी बेटी एक गरीब रिक्शेवाले के घर में है…
तो उनका गुस्सा सातवें आसमान पर पहुँच गया सुबह का समय था।
बारिश रुक चुकी थी, लेकिन आसमान अब भी बादलों से भरा हुआ था।
करण के छोटे-से घर की टूटी खिड़की से हल्की धूप अंदर आ रही थी।
निशा की आँख खुली तो कुछ पल के लिए उसे समझ ही नहीं आया कि वो कहाँ है।
उसने धीरे-धीरे चारों तरफ देखा।
मिट्टी की दीवारें…
पुराना पंखा…
कोने में रखा मिट्टी का चूल्हा…
और छत से लटकता हुआ एक छोटा बल्ब।
यह सब उसकी दुनिया से बिल्कुल अलग था।
वो बड़े बंगले में पली थी।
जहाँ सुबह नौकर चाय लेकर आते थे…
जहाँ एसी के बिना कोई नहीं सोता था…
जहाँ हर चीज़ पैसे से खरीदी जाती थी।
लेकिन यहाँ…
यहाँ गरीबी थी…
सादगी थी…
और एक अजीब-सी शांति थी।
तभी बाहर से खाँसी की आवाज़ आई।
निशा उठकर बाहर आई तो देखा—
करण की माँ चूल्हे पर चाय बना रही थीं।
कमज़ोर हाथ…
झुका हुआ शरीर…
लेकिन चेहरे पर अपनापन साफ दिखाई दे रहा था।
उन्होंने निशा को देखकर मुस्कुराते हुए कहा—
“आ गई बेटी? बैठो… अभी चाय बन जाती है।”
निशा कुछ पल उन्हें देखती रही।
इतना अपनापन उसे अपने घर में भी नहीं मिला था।
वो धीरे से बोली—
“अम्मा… मैं बना देती हूँ।”
अम्मा हँस पड़ीं—
“तुम्हारे नाज़ुक हाथों ने कभी चूल्हा देखा भी होगा?”
निशा चुप हो गई।
सच तो यही था।
उसने जिंदगी में कभी खुद से पानी तक नहीं लिया था।
तभी करण बाहर से आया।
वो सुबह-सुबह दूध लेने गया था।
उसने निशा को देखकर पूछा—
“आप ठीक से सो पाईं?”
निशा ने हल्की मुस्कान के साथ सिर हिला दिया।
फिर उसकी नज़र करण के पैरों पर गई।
पैरों में चप्पल तक नहीं थी।
बारिश की वजह से पैर मिट्टी से भरे हुए थे।
लेकिन फिर भी उसके चेहरे पर शिकायत नहीं थी।
करण ने अम्मा को दवाई दी और बोला—
“अम्मा, ये सुबह वाली गोली खा लो।”
निशा सब देख रही थी।
उसे पहली बार समझ आ रहा था कि गरीबी कैसी होती है।
जहाँ इंसान खुद भूखा रह सकता है…
लेकिन अपने लोगों का दर्द नहीं देख सकता।
कुछ देर बाद करण रिक्शा लेकर काम पर जाने लगा।
जाते-जाते उसने निशा से कहा—
“डरिए मत… यहाँ आप सुरक्षित हैं।”
उसकी आवाज़ में इतनी सच्चाई थी कि निशा का दिल अचानक शांत हो गया।
करण चला गया।
पूरा दिन निशा घर में अम्मा के साथ रही।
धीरे-धीरे उसने घर के छोटे-छोटे काम करने शुरू कर दिए।
कभी पानी भरती…
कभी दवाई देती…
कभी घर साफ करती।
अम्मा बार-बार उसे रोकतीं—
“बेटी रहने दो… तुम्हें आदत नहीं है।”
लेकिन निशा मुस्कुराकर कहती—
“शायद अब सीखने की आदत डालनी पड़ेगी अम्मा।”
शाम होने लगी।
सूरज ढल रहा था।
निशा घर के बाहर बैठी थी तभी अचानक गली में कई बड़ी गाड़ियों की आवाज़ गूँजने लगी।
पूरा मोहल्ला बाहर निकल आया।
काली SUV गाड़ियाँ घर के सामने आकर रुकीं।
उनमें से कई आदमी उतरे।
सफेद कपड़े…
काले चश्मे…
और हाथों में डंडे।
उनके पीछे एक बड़ी कार से उतरे—
सेठ रणवीर मल्होत्रा।
निशा के पिता।
पूरा मोहल्ला डर गया।
इतने बड़े आदमी को वहाँ पहली बार देखा गया था।
करण भी उसी समय रिक्शा लेकर घर पहुँचा।
वो समझ गया—
मुसीबत आ चुकी है।
सेठ रणवीर ने गुस्से से निशा की तरफ देखा।
“तुम यहाँ क्या कर रही हो?”
निशा डर गई… लेकिन इस बार वो चुप नहीं रही।
“मैं आपके साथ वापस नहीं जाऊँगी।”
यह सुनते ही रणवीर का चेहरा लाल हो गया।
“तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई मुझसे ऊँची आवाज़ में बात करने की?”
फिर उनकी नज़र करण पर गई।
उन्होंने उसे ऊपर से नीचे तक देखा…
गीले कपड़े…
गरीब रिक्शेवाला…
छोटा घर…
उनकी आँखों में नफरत साफ दिखाई दे रही थी।
“तो ये है वो लड़का…”
करण ने हाथ जोड़कर कहा—
“सेठ जी, आपने गलत समझा है। मैंने सिर्फ इनकी मदद—”
“चुप!” रणवीर चीखे।
“तुम जैसे लोग पैसों के लिए कुछ भी कर सकते हो!”
पूरा मोहल्ला सन्न हो गया।
करण की मुट्ठियाँ भींच गईं…
लेकिन उसने फिर भी खुद को शांत रखा।
निशा गुस्से में बोली—
“पापा! इन्होंने मेरी जान बचाई है!”
लेकिन रणवीर ने उसकी एक नहीं सुनी।
उन्होंने जेब से मोटी गड्डी निकाली और करण के सामने फेंक दी।
“ये लो पाँच लाख रुपये…”
“और मेरी बेटी से दूर हो जाओ।”
पूरा मोहल्ला हैरान रह गया।
इतने पैसे शायद किसी ने एक साथ पहली बार देखे थे।
कुछ पल के लिए वहाँ सन्नाटा छा गया।
सबकी नज़र करण पर टिक गई।
गरीब रिक्शेवाला…
जिसके घर में खाने तक के पैसे नहीं…
क्या वो इतने पैसे देखकर बदल जाएगा?
करण ने धीरे-धीरे नीचे पड़े पैसों की तरफ देखा।
फिर अपनी बीमार माँ की तरफ…
फिर निशा की तरफ।
उसके अंदर जैसे तूफान चल रहा था।
लेकिन अगले ही पल उसने वो पैसे उठाए…
और सीधे रणवीर मल्होत्रा के पैरों में वापस रख दिए।
पूरा मोहल्ला दंग रह गया।
करण की आँखों में आँसू थे।
वो धीरे से बोला—
“गरीब हूँ सेठ जी… बिकाऊ नहीं।”
यह सुनते ही निशा की आँखें भर आईं।
और पहली बार…
उसके दिल में उस गरीब रिक्शेवाले के लिए कुछ बदलने लगा करण की बात सुनकर पूरा मोहल्ला कुछ पल के लिए बिल्कुल शांत हो गया।
“गरीब हूँ सेठ जी… बिकाऊ नहीं।”
ये शब्द सीधे निशा के दिल में उतर गए।
उसने पहली बार किसी गरीब इंसान को इतना स्वाभिमानी देखा था।
सेठ रणवीर मल्होत्रा का चेहरा गुस्से से लाल हो चुका था।
उन्होंने जोर से कहा—
“तुम्हारी औकात क्या है मेरे सामने?”
करण चुप खड़ा रहा।
उसकी आँखों में डर नहीं था…
बस सम्मान था।
वो धीरे से बोला—
“औकात इंसान के पैसों से नहीं… उसके कर्मों से होती है सेठ जी।”
इतना सुनते ही रणवीर का गुस्सा और बढ़ गया।
उन्होंने अपने आदमियों को इशारा किया—
“इस लड़के को सबक सिखाओ!”
चार आदमी तुरंत करण की तरफ बढ़े।
निशा डर गई।
“नहीं पापा!”
लेकिन किसी ने उसकी बात नहीं सुनी।
एक आदमी ने करण का कॉलर पकड़ लिया।
दूसरे ने उसे जोर से धक्का दिया।
करण जमीन पर गिर पड़ा।
अम्मा घबरा गईं।
“मेरे बेटे को मत मारो!”
लेकिन गुंडे लगातार करण को मारते रहे।
पूरा मोहल्ला देख रहा था…
लेकिन सेठ रणवीर के डर से कोई आगे नहीं आया।
निशा रोते हुए करण के सामने आ गई।
“बस कीजिए!”
उसने अपने पिता की तरफ देखकर कहा—
“अगर इन्हें कुछ हुआ… तो मैं कभी आपके साथ नहीं जाऊँगी!”
रणवीर कुछ पल के लिए रुक गए।
उन्होंने गुस्से से करण को देखा।
करण के होंठ से खून निकल रहा था…
लेकिन उसने फिर भी कोई जवाब नहीं दिया।
वो बस एक ही बात सोच रहा था—
“निशा सुरक्षित रहे…”
तभी अचानक अम्मा को जोर की खाँसी शुरू हो गई।
वो दीवार पकड़कर नीचे बैठ गईं।
करण तुरंत उनकी तरफ भागा।
“अम्मा!”
निशा भी घबरा गई।
अम्मा की साँसें तेज चल रही थीं।
करण डर गया।
उसे समझ नहीं आ रहा था क्या करे।
निशा तुरंत बोली—
“जल्दी अस्पताल चलते हैं!”
करण हिचकिचाया।
उसकी जेब में पैसे नहीं थे।
ये बात निशा समझ गई।
उसने बिना कुछ कहे कार की चाबी अपने पिता के ड्राइवर से छीनी और बोली—
“जल्दी गाड़ी निकालो!”
रणवीर हैरान रह गए।
उन्होंने पहली बार अपनी बेटी को इस तरह किसी गरीब परिवार के लिए परेशान होते देखा था।
कुछ ही देर में सब अस्पताल पहुँचे।
डॉक्टर अम्मा को अंदर ले गए।
बाहर करण बेचैनी से बैठा था।
उसकी आँखों में डर साफ दिखाई दे रहा था।
वो बार-बार भगवान से प्रार्थना कर रहा था—
“मेरी अम्मा को बचा लो…”
निशा पहली बार उसे इतने करीब से देख रही थी।
गरीब कपड़े…
थका हुआ चेहरा…
आँखों में दर्द…
लेकिन अपनी माँ के लिए इतना प्यार।
उसका दिल धीरे-धीरे बदल रहा था।
कुछ देर बाद डॉक्टर बाहर आए।
“मरीज की हालत बहुत कमजोर है।”
करण डरते हुए बोला—
“डॉक्टर साहब… अम्मा ठीक तो हो जाएँगी ना?”
डॉक्टर ने गंभीर आवाज़ में कहा—
“इलाज तुरंत शुरू करना होगा…”
“लेकिन उसके लिए करीब दो लाख रुपये लगेंगे।”
ये सुनते ही करण के पैरों तले जमीन खिसक गई।
दो लाख…
उसने जिंदगी में इतने पैसे कभी नहीं देखे थे।
उसकी आँखें भर आईं।
वो धीरे-धीरे अस्पताल की कुर्सी पर बैठ गया।
उसे समझ नहीं आ रहा था क्या करे।
तभी निशा उसके पास आई।
उसने धीरे से कहा—
“इलाज शुरू करवाइए… पैसे मैं दूँगी।”
करण तुरंत खड़ा हो गया।
“नहीं!”
निशा हैरान रह गई।
करण बोला—
“मैं आपकी मदद का एहसान नहीं ले सकता।”
निशा की आँखों में आँसू आ गए।
“ये एहसान नहीं है करण…”
“ये इंसानियत है।”
करण कुछ नहीं बोला।
उसके अंदर स्वाभिमान और मजबूरी की लड़ाई चल रही थी।
तभी डॉक्टर बोले—
“अगर इलाज देर से शुरू हुआ… तो मरीज को बचाना मुश्किल होगा।”
यह सुनते ही करण टूट गया।
उसने काँपती आवाज़ में कहा—
“ठीक है…”
“लेकिन मैं आपके सारे पैसे लौटाऊँगा।”
निशा हल्का मुस्कुराई।
“मुझे भरोसा है।”
करण की आँखों में आँसू आ गए।
उसे जिंदगी में पहली बार कोई ऐसा मिला था…
जिसने उसकी गरीबी नहीं… उसका दिल देखा।
उधर दूसरी तरफ…
सेठ रणवीर अस्पताल के बाहर खड़े सब देख रहे थे।
उन्हें बिल्कुल अच्छा नहीं लग रहा था कि उनकी बेटी एक गरीब रिक्शेवाले के लिए इतनी परेशान हो रही है।
उनके मन में गुस्सा बढ़ता जा रहा था।
उन्होंने अपने खास आदमी विजय को बुलाया और धीरे से कहा—
“इस लड़के को मेरी बेटी की जिंदगी से हमेशा के लिए दूर करना होगा…”
विजय ने पूछा—
“क्या करना है सेठ जी?”
रणवीर की आँखों में खतरनाक चमक आ गई।
उन्होंने धीमी आवाज़ में कहा—
“ऐसा खेल खेलो…”
“कि मेरी बेटी खुद उससे नफरत करने लगे…”
और उसी पल…
करण की जिंदगी के खिलाफ एक खतरनाक साजिश शुरू हो चुकी थी अस्पताल की रात बहुत भारी थी।
चारों तरफ दवाइयों की गंध फैली हुई थी।
दीवारों पर सफेद रोशनी पड़ रही थी।
कहीं कोई रो रहा था…
कहीं डॉक्टर भागते हुए दिखाई दे रहे थे…
और उसी अस्पताल के एक कोने में करण अकेला बैठा था।
उसकी आँखें पूरी रात नहीं झपकी थीं।
बार-बार उसकी नज़र ICU के दरवाज़े पर चली जाती, जहाँ उसकी अम्मा जिंदगी और मौत के बीच लड़ रही थीं।
निशा उसके पास ही बैठी थी।
उसने पहली बार इतने करीब से गरीबी की तकलीफ़ देखी थी।
जहाँ इंसान रो भी नहीं सकता…
क्योंकि आँसू पोंछने वाला कोई नहीं होता।
करण दोनों हाथ जोड़कर सिर झुकाए बैठा था।
उसके होंठ धीरे-धीरे हिल रहे थे—
“भगवान… मेरी अम्मा को बचा लो…”
निशा की आँखें भर आईं।
उसने धीरे से कहा—
“कुछ नहीं होगा अम्मा को…”
करण ने उसकी तरफ देखा।
उसकी आँखों में दर्द था।
“अगर अम्मा को कुछ हो गया ना… तो मैं बिल्कुल अकेला हो जाऊँगा।”
ये कहते हुए उसकी आवाज टूट गई।
निशा का दिल काँप उठा।
वो पहली बार किसी लड़के के दर्द को इतनी गहराई से महसूस कर रही थी।
तभी अचानक पीछे से ताली बजाने की आवाज आई।
“वाह…”
दोनों ने पीछे मुड़कर देखा।
सेठ रणवीर मल्होत्रा खड़े थे।
उनके चेहरे पर गुस्सा साफ दिखाई दे रहा था।
उन्होंने निशा की तरफ देखकर कहा—
“तो अब तुम रातें भी इसके साथ बिताने लगी?”
निशा तुरंत खड़ी हो गई।
“पापा! आप गलत सोच रहे हैं!”
लेकिन रणवीर हँस पड़े।
“गलत?”
“एक रिक्शेवाले के लिए अपनी फैमिली छोड़ दी… और अब मुझे गलत बोल रही हो?”
करण ने शांत आवाज़ में कहा—
“सेठ जी, आप मुझे जो कहना चाहते हैं कहिए… लेकिन निशा जी को मत—”
“चुप!” रणवीर चीखे।
“तुम जैसे लड़के अमीर लड़कियों को फँसाने का काम करते हो!”
करण की मुट्ठियाँ भींच गईं।
लेकिन उसने खुद को संभाल लिया।
निशा गुस्से में बोली—
“बस कीजिए पापा!”
“करण वैसे इंसान नहीं हैं जैसा आप सोच रहे हैं!”
रणवीर की आँखें लाल हो गईं।
उन्होंने ठंडी आवाज़ में कहा—
“ठीक है…”
“अब मैं तुम्हें इसकी असली औकात दिखाऊँगा।”
इतना कहकर वो वहाँ से चले गए।
करण के मन में अजीब डर बैठ गया।
उसे लग रहा था…
कुछ बहुत गलत होने वाला है।
अगली सुबह…
अस्पताल के बाहर अचानक पुलिस की गाड़ी आकर रुकी।
दो पुलिसवाले अंदर आए।
“करण कौन है?”
करण खड़ा हो गया।
“जी… मैं।”
इंस्पेक्टर ने सख्त आवाज़ में कहा—
“तुम्हें चोरी के आरोप में गिरफ्तार किया जाता है।”
करण और निशा दोनों हैरान रह गए।
“चोरी?” निशा चौंकी।
इंस्पेक्टर बोला—
“कल रात सेठ रणवीर मल्होत्रा के घर से बीस लाख रुपये और ज्वेलरी गायब हुई है…”
“और सारे सबूत तुम्हारे खिलाफ हैं।”
करण के पैरों तले जमीन खिसक गई।
“नहीं साहब! मैंने कुछ नहीं किया!”
लेकिन पुलिस ने उसकी एक नहीं सुनी।
उन्होंने करण को पकड़ लिया।
निशा चिल्लाई—
“ये झूठ है!”
तभी पीछे से सेठ रणवीर आए।
उनके चेहरे पर नकली दुख था।
“मुझे पहले ही शक था इस लड़के पर…”
करण समझ गया—
ये सब साजिश है।
उसने गुस्से में कहा—
“आप मुझे फँसा रहे हैं!”
रणवीर धीरे से उसके पास आए और कान में बोले—
“मैंने कहा था ना… मेरी बेटी से दूर हो जाओ।”
करण की आँखों में आग भर गई।
लेकिन वो कुछ कर नहीं सकता था।
पूरा अस्पताल उसे ऐसे देख रहा था जैसे वो सच में चोर हो।
कुछ देर बाद पुलिस उसे थाने ले गई।
निशा लगातार रो रही थी।
वो अपने पिता से बोली—
“आपने ये सब किया है ना?”
रणवीर गुस्से में बोले—
“हाँ किया है!”
“और अगर तुमने उस लड़के से रिश्ता नहीं तोड़ा… तो उसकी जिंदगी पूरी तरह बर्बाद कर दूँगा!”
निशा सन्न रह गई।
उसे यकीन नहीं हो रहा था कि उसका अपना पिता इतना नीचे गिर सकता है।
उधर थाने में…
करण को लॉकअप में बंद कर दिया गया।
अंदर बदबू…
गंदगी…
और अपराधियों की आवाजें गूँज रही थीं।
करण दीवार के सहारे बैठ गया।
उसकी आँखों के सामने बार-बार अम्मा का चेहरा आ रहा था।
“अगर अम्मा को पता चला… तो वो टूट जाएँगी…”
उसकी आँखों से आँसू निकल पड़े।
लेकिन तभी अचानक लॉकअप के बाहर हलचल हुई।
एक बड़ी गाड़ी थाने के सामने आकर रुकी।
सभी पुलिसवाले अचानक सीधे खड़े हो गए।
थानेदार खुद बाहर भागा।
कुछ ही सेकंड बाद…
एक बड़ा बिजनेसमैन अंदर आया।
महँगा सूट…
रौबदार चेहरा…
और पीछे कई बॉडीगार्ड।
करण ने उसे देखा तो हैरान रह गया।
ये वही आदमी था…
जिसकी जान उसने बारिश वाली रात बचाई थी—
सेठ धर्मपाल।
पूरा थाना उनके सामने झुक रहा था।
सेठ धर्मपाल सीधे इंस्पेक्टर के पास गए और बोले—
“जिस लड़के को तुमने गिरफ्तार किया है…”
“वो चोर नहीं…”
“मेरी जान बचाने वाला फरिश्ता है।”
पूरा थाना सन्न रह गया पूरा थाना एकदम शांत हो गया।
इंस्पेक्टर की आँखें फैल गईं।
“सेठ धर्मपाल… आप इस लड़के को जानते हैं?”
सेठ धर्मपाल ने करण की तरफ देखा।
उनकी आँखों में सम्मान साफ दिखाई दे रहा था।
“ये सिर्फ लड़का नहीं है…”
“इसने अपनी जान खतरे में डालकर मेरी जान बचाई थी।”
करण हैरान खड़ा था।
उसे उम्मीद ही नहीं थी कि इतना बड़ा आदमी उसके लिए थाने तक आएगा।
सेठ धर्मपाल ने इंस्पेक्टर की तरफ गुस्से से देखा—
“और तुमने इसे चोर बना दिया?”
इंस्पेक्टर घबरा गया।
“स-साहब… हमारे पास सबूत थे…”
धर्मपाल गरजे—
“सबूत खरीदे भी जा सकते हैं!”
पूरा थाना डर गया।
तभी धर्मपाल के साथ आए एक आदमी ने फाइल निकालकर इंस्पेक्टर को दी।
“सर, हमने CCTV फुटेज निकलवाई है…”
“चोरी करण ने नहीं… सेठ रणवीर के आदमी विजय ने की थी।”
यह सुनते ही सबके होश उड़ गए।
इंस्पेक्टर ने जल्दी से फुटेज देखी।
वीडियो में साफ दिखाई दे रहा था—
विजय खुद अलमारी से पैसे और गहने निकाल रहा था।
और फिर करण के रिक्शे में वो बैग रख रहा था।
पूरा सच सामने आ चुका था।
करण की आँखों में आँसू आ गए।
उसे जिंदगी में पहली बार लगा—
शायद भगवान अभी भी उसके साथ हैं।
इंस्पेक्टर तुरंत करण के पास आया।
“हमें माफ कर दो बेटा… हमसे गलती हो गई।”
और उसी वक्त करण के हाथों की हथकड़ी खोल दी गई।
करण बाहर आया तो निशा दौड़कर उसके पास आ गई।
उसकी आँखों से आँसू रुक ही नहीं रहे थे।
“मुझे पता था… आप ऐसा कभी नहीं कर सकते…”
करण बस उसे देखता रहा।
दोनों की आँखों में हजारों बातें थीं…
लेकिन शब्द नहीं थे।
तभी पीछे से सेठ धर्मपाल बोले—
“अब इस लड़के की जिंदगी कोई खराब नहीं करेगा।”
उनकी आवाज इतनी भारी थी कि पूरा थाना शांत हो गया।
उधर दूसरी तरफ…
जब सेठ रणवीर को पता चला कि सच्चाई सामने आ गई है…
तो उनके चेहरे का रंग उड़ गया।
वो गुस्से में विजय पर चिल्लाए—
“निकम्मे! मैंने कहा था कोई गलती नहीं होनी चाहिए!”
विजय डरते हुए बोला—
“साहब… मुझे क्या पता था धर्मपाल बीच में आ जाएगा…”
रणवीर समझ चुके थे—
अब मामला हाथ से निकल रहा है।
लेकिन उनका घमंड अभी खत्म नहीं हुआ था।
उन्होंने ठंडी आवाज़ में कहा—
“अगर वो लड़का मेरी बेटी के रास्ते से नहीं हटा…”
“तो मैं उसे जिंदा नहीं छोड़ूँगा।”
उधर…
सेठ धर्मपाल करण को अपने बड़े ऑफिस ले गए।
करण जिंदगी में पहली बार इतनी बड़ी बिल्डिंग के अंदर आया था।
चारों तरफ शीशे की दीवारें…
बड़े-बड़े लोग…
महँगे कपड़े…
वो खुद को वहाँ बिल्कुल छोटा महसूस कर रहा था।
धर्मपाल ने उसकी तरफ देखकर मुस्कुराते हुए कहा—
“डर मत बेटा।”
“एक दिन लोग तुझसे मिलने के लिए लाइन लगाएंगे।”
करण हैरान था।
“लेकिन सेठ जी… मैं तो सिर्फ रिक्शा चलाना जानता हूँ।”
धर्मपाल मुस्कुराए।
“नहीं…”
“तू मेहनत करना जानता है।”
“और मेहनत करने वाला इंसान कभी छोटा नहीं रहता।”
फिर उन्होंने टेबल पर एक फाइल रखी।
“आज से तू मेरी ट्रांसपोर्ट कंपनी में काम करेगा।”
करण चौंक गया।
“मैं?”
“हाँ।”
“पहले ड्राइवरों का काम संभाल… फिर धीरे-धीरे बिजनेस सीख।”
करण की आँखें भर आईं।
उसे पहली बार जिंदगी में कोई मौका मिला था।
उसने काँपते हाथों से फाइल उठाई।
“मैं मेहनत करूँगा सेठ जी…”
धर्मपाल मुस्कुराए—
“मुझे पता है।”
धीरे-धीरे दिन गुजरने लगे।
करण दिन-रात मेहनत करने लगा।
सुबह सबसे पहले ऑफिस आता…
रात सबसे बाद में जाता।
वो ड्राइवरों से बात करता…
गाड़ियों का हिसाब रखता…
लोडिंग देखता…
और हर दिन कुछ नया सीखता।
धर्मपाल भी उसे बेटे की तरह सिखाने लगे।
पूरा ऑफिस अब करण की इज़्ज़त करने लगा था।
लेकिन…
जैसे-जैसे करण आगे बढ़ रहा था…
वैसे-वैसे रणवीर मल्होत्रा का गुस्सा भी बढ़ता जा रहा था।
एक रात रणवीर अपने कमरे में बैठे शराब पी रहे थे।
उनकी आँखों में नफरत साफ दिखाई दे रही थी।
उन्होंने फोन उठाया और किसी को कॉल किया।
“काम करना है…”
दूसरी तरफ से आवाज आई—
“कौन सा काम सेठ जी?”
रणवीर धीरे से बोले—
“करण नाम का एक लड़का है…”
“मुझे वो हमेशा के लिए रास्ते से हटाना है।”
यह सुनते ही कमरे में खामोशी छा गई।
उधर उसी समय…
करण ऑफिस से देर रात घर लौट रहा था।
सड़क सुनसान थी।
हल्की बारिश हो रही थी।
उसे बिल्कुल अंदाज़ा नहीं था…
कि कुछ लोग उसका पीछा कर रहे हैं।
अचानक पीछे से एक काली गाड़ी तेज़ी से उसकी तरफ बढ़ी।
करण कुछ समझ पाता…
उससे पहले—
“धड़ाम!!!”
गाड़ी ने उसे जोरदार टक्कर मार दी।
करण हवा में उछलकर सड़क पर जा गिरा।
उसके सिर से खून बहने लगा।
बारिश का पानी धीरे-धीरे लाल होने लगा।
गाड़ी तुरंत वहाँ से भाग गई।
करण दर्द से तड़प रहा था।
उसकी आँखें धीरे-धीरे बंद होने लगीं।
और बेहोश होने से पहले…
उसके होंठों पर सिर्फ एक नाम था


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