जिन्न को रिक्शे वाले से मोहब्बत

 उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गाँव में राजू नाम का एक गरीब रिक्शा वाला रहता था।

पूरा दिन वह लोगों को बाजार, स्टेशन और गाँव तक छोड़ता था।

उसका पुराना रिक्शा ही उसकी पूरी दुनिया था।

राजू का कोई अपना नहीं था।

ना माँ…

ना बाप…

बस गाँव के किनारे एक टूटा हुआ छोटा सा घर।

लेकिन राजू बहुत अच्छा लड़का था।

गरीब होने के बाद भी हमेशा लोगों की मदद करता था।

हर रात काम खत्म करने के बाद वह गाँव के बाहर पुराने बरगद के पेड़ के पास रुकता था।

वहाँ बैठकर चाय पीता और थोड़ी देर आराम करता।

गाँव वाले कहते थे कि उस बरगद के पेड़ के पास रात में कोई नहीं जाता।

लोग बोलते थे—










“वहाँ कुछ है…”

लेकिन राजू इन बातों पर विश्वास नहीं करता था।

एक रात मौसम बहुत खराब था।

तेज हवा चल रही थी।

आसमान में बिजली चमक रही थी।

राजू अपना रिक्शा लेकर उसी रास्ते से जा रहा था।

तभी अचानक उसकी नजर बरगद के पेड़ के नीचे खड़ी एक लड़की पर पड़ी।

सफेद कपड़े…

लंबे काले बाल…

और चेहरा बिल्कुल शांत।

इतनी रात में उसे वहाँ देखकर राजू रुक गया।

राजू ने धीरे से पूछा—

“बहन जी… इतनी रात को यहाँ क्या कर रही हो?”

लड़की ने धीरे से उसकी तरफ देखा।

उसकी आँखें बहुत अजीब थीं… जैसे उनमें कोई गहरा दर्द छिपा हो।

फिर वह धीमी आवाज में बोली—

“क्या तुम मुझे गाँव तक छोड़ दोगे?”














राजू ने तुरंत कहा—

“हाँ… बैठ जाइए।”

लड़की रिक्शे में बैठ गई।

लेकिन जैसे ही वह बैठी…

राजू को कुछ अजीब महसूस हुआ।

रिक्शा बिल्कुल हल्का था…

जैसे उसमें कोई बैठा ही ना हो।

राजू थोड़ा डर गया।

उसने पीछे मुड़कर देखा।

लड़की बस उसे लगातार देख रही थी।

पूरा रास्ता दोनों के बीच कोई बात नहीं हुई।

जब गाँव आया तो लड़की रिक्शे से नीचे उतरी।

फिर मुस्कुराकर बोली—

“कल भी यहीं मिलोगे?”

राजू कुछ समझ नहीं पाया।

लेकिन ना जाने क्यों उसने हाँ कह दिया।

लड़की धीरे-धीरे अंधेरे में चली गई।

राजू काफी देर तक उसे जाता हुआ देखता रहा।

उसे पहली बार महसूस हुआ कि उस लड़की में कुछ अलग था…

कुछ ऐसा…

जो इंसानों जैसा नहीं था…  अगली रात राजू पूरे दिन बेचैन रहा।


बार-बार उसका ध्यान उसी लड़की की तरफ जा रहा था।


उसे खुद समझ नहीं आ रहा था कि आखिर वह लड़की कौन थी।


रात होते ही राजू जल्दी काम खत्म करके फिर उसी बरगद के पेड़ के पास पहुँच गया।


चारों तरफ सन्नाटा था।

ठंडी हवा चल रही थी।


राजू इधर-उधर देखने लगा।


तभी अचानक पीछे से वही धीमी आवाज आई—


“तुम आ गए…”


राजू ने पलटकर देखा।


वही लड़की उसके पीछे खड़ी थी।


आज भी उसने सफेद कपड़े पहने थे।

उसके लंबे बाल हवा में उड़ रहे थे।


राजू हल्का सा मुस्कुराया।


“मुझे लगा शायद तुम नहीं आओगी।”


लड़की बोली—


“मैं रोज आती हूँ… बस लोग मुझे देख नहीं पाते।”


राजू ये बात सुनकर थोड़ा अजीब महसूस करने लगा।


फिर भी उसने डर छुपाते हुए पूछा—


“तुम्हारा नाम क्या है?”


लड़की कुछ सेकंड चुप रही।


फिर बोली—


“मेहर…”


राजू को उसका नाम बहुत अच्छा लगा।


उस रात दोनों काफी देर तक बातें करते रहे।


मेहर बहुत कम बोलती थी…

लेकिन जब भी बोलती, उसकी आवाज सुनकर राजू को अजीब सुकून मिलता।


धीरे-धीरे ये रोज का सिलसिला बन गया।


हर रात राजू उसी पेड़ के पास आता…

और मेहर उससे मिलने आ जाती।


एक दिन मेहर ने पूछा—


“तुम पूरे दिन इतना मेहनत क्यों करते हो?”


राजू हँस पड़ा।


“गरीब आदमी हूँ… मेहनत नहीं करूँगा तो खाऊँगा क्या?”


मेहर पहली बार हल्का सा मुस्कुराई।


उसकी मुस्कान बहुत खूबसूरत थी।


धीरे-धीरे राजू को मेहर से लगाव होने लगा।


अब उसे रात का इंतजार रहने लगा था।


लेकिन गाँव वालों ने भी बदलाव नोटिस करना शुरू कर दिया था।


राजू अब रात में अक्सर अकेले किसी से बातें करता दिखाई देता था।


एक दिन चाय वाले काका ने पूछा—


“राजू… तू रात में किससे मिलने जाता है?”


राजू थोड़ा घबरा गया।


“को… कोई नहीं काका।”


काका ने डरते हुए कहा—


“देख बेटा… उस बरगद वाले रास्ते पर ठीक चीजें नहीं रहतीं…”


राजू हँसकर बात टाल गया।


लेकिन उसी रात जब वह मेहर से मिला…

तो उसने पहली बार एक बहुत डरावनी चीज देखी।


राजू और मेहर साथ बैठे थे।


तभी अचानक तेज हवा चलने लगी।


राजू का ध्यान मेहर के पैरों पर गया…


और ये देखकर उसका खून जम गया…


मेहर के पैर जमीन से थोड़े ऊपर थे…


वह हवा में खड़ी थी…


राजू डरकर पीछे हट गया।


“तु… तुम कौन हो…?”


मेहर की आँखें उदास हो गईं।


वह धीरे से बोली—


“अगर सच जानोगे… तो शायद मुझसे डरने लगोगे…”


राजू के हाथ काँपने लगे…


और पहली बार उसे एहसास हुआ…


कि गाँव वाले शायद सच बोल रहे थे राजू डर के मारे लगातार पीछे हट रहा था।


उसका दिल बहुत तेज धड़क रहा था।


मेहर चुपचाप उसे देख रही थी।


हवा और तेज हो चुकी थी।

बरगद के पत्ते जोर-जोर से हिल रहे थे।


राजू काँपती आवाज में बोला—


“स… सच बताओ… तुम इंसान हो भी या नहीं…?”


कुछ देर तक मेहर चुप रही।


फिर उसकी आँखों में आँसू आ गए।


उसने धीरे से कहा—


“नहीं… मैं इंसान नहीं हूँ…”


इतना सुनते ही राजू के पैरों तले जमीन खिसक गई।


वह डरकर अपना रिक्शा पकड़कर खड़ा हो गया।


मेहर ने नीचे नजर करते हुए कहा—


“मैं एक जिन्न हूँ…”


ये सुनते ही राजू का पूरा शरीर काँपने लगा।


उसे गाँव वालों की सारी बातें याद आने लगीं।


बरगद का पेड़…

रात की परछाइयाँ…

और लोगों की डरावनी कहानियाँ…


राजू भागना चाहता था…


लेकिन ना जाने क्यों उसके कदम वहीं रुक गए।


मेहर रोते हुए बोली—


“मैं तुम्हें नुकसान नहीं पहुँचाऊँगी…”


उसकी आवाज में दर्द साफ सुनाई दे रहा था।


“मैं कई सालों से अकेली हूँ… लोग मुझे देखकर डर जाते हैं…”


राजू धीरे-धीरे शांत होने लगा।


उसने हिम्मत करके पूछा—


“तुम यहाँ क्यों रहती हो…?”


मेहर ने बरगद के पेड़ की तरफ देखा।


फिर बोली—


“बहुत साल पहले कुछ लोगों ने मुझे इसी पेड़ में कैद कर दिया था…”


राजू ध्यान से उसकी बातें सुनने लगा।


“मैं किसी को नुकसान नहीं पहुँचाती थी… लेकिन लोगों ने मुझे अपशकुन समझ लिया…”


मेहर की आँखों से आँसू गिरने लगे।


“उस दिन से मैं यहीं हूँ… अकेली…”


राजू पहली बार उसका दर्द महसूस कर पा रहा था।


उसे डर तो अभी भी लग रहा था…


लेकिन मेहर की बातें सुनकर उसके दिल में उसके लिए हमदर्दी भी होने लगी।


तभी अचानक दूर से कुछ लोगों की आवाजें आने लगीं।


गाँव वाले मशाल लेकर उस तरफ आ रहे थे।


एक आदमी चिल्लाया—


“वो यहीं है… मैंने राजू को इसी पेड़ के पास देखा था!”


राजू घबरा गया।


“गाँव वाले यहाँ क्यों आ रहे हैं?”


मेहर डर गई।


उसकी आँखें अचानक लाल होने लगीं।


हवा और तेज चलने लगी।


राजू ने पहली बार मेहर का डरावना रूप देखा।


उसके बाल हवा में उड़ रहे थे…

आँखें चमक रही थीं…


लेकिन फिर भी उसने राजू को नुकसान नहीं पहुँचाया।


मेहर घबराकर बोली—


“तुम यहाँ से चले जाओ… अभी!”


लेकिन राजू वहीं खड़ा रहा।


उसे पहली बार महसूस हुआ…


कि मेहर बुरी नहीं थी…


वो बस अकेली थी…


तभी गाँव वालों की मशालों की रोशनी बरगद के पेड़ तक पहुँच गई…


और सबकी नजर सीधे मेहर पर पड़ी जैसे ही गाँव वालों ने मेहर को देखा…

चारों तरफ डर और चीखें फैल गईं।


एक आदमी जोर से चिल्लाया—


“ये इंसान नहीं है!”


दूसरा आदमी बोला—


“मैंने कहा था ना… ये वही जिन्न है!”


कुछ लोग डरकर पीछे हट गए…

लेकिन कुछ लोग गुस्से में मशाल और लाठियाँ लेकर आगे बढ़ने लगे।


राजू तुरंत मेहर के सामने खड़ा हो गया।


“कोई इसके पास नहीं आएगा!”


गाँव वाले हैरान रह गए।


चाय वाले काका बोले—


“राजू पागल हो गया है! ये तुझे मार डालेगी!”


राजू चिल्लाया—


“नहीं! ये बुरी नहीं है!”


लेकिन कोई उसकी बात सुनने को तैयार नहीं था।


एक आदमी ने जलती हुई मशाल मेहर की तरफ फेंकी।


मेहर डरकर पीछे हट गई।


उसकी आँखों में आँसू आ गए।


राजू गुस्से में उस आदमी पर चिल्लाया—


“शर्म नहीं आती? अकेली लड़की पर हमला कर रहे हो!”


तभी अचानक हवा बहुत तेज चलने लगी।


आसमान में जोरदार बिजली चमकी।


बरगद का पेड़ जोर-जोर से हिलने लगा।


गाँव वाले डर गए।


मेहर की आँखें लाल हो चुकी थीं।


उसके आसपास काला धुआँ घूमने लगा।


राजू समझ गया कि मेहर खुद को रोकने की कोशिश कर रही है।


मेहर दर्द में चिल्लाई—


“मुझे मजबूर मत करो!”


उसकी आवाज पूरी रात में गूँज उठी।


कुछ लोग डरकर भागने लगे।


लेकिन गाँव का मुखिया आगे आया।


उसने गुस्से में कहा—


“आज इसे खत्म कर दो!”


इतना सुनते ही मेहर के अंदर का गुस्सा फूट पड़ा।


अचानक तेज तूफान आ गया।


मशालें बुझ गईं।

लोग जमीन पर गिरने लगे।


लेकिन मेहर ने किसी को हाथ तक नहीं लगाया।


वह सिर्फ रो रही थी…


राजू ने उसका हाथ पकड़ लिया।


“मेहर… शांत हो जाओ… प्लीज़…”


मेहर ने आँसू भरी आँखों से राजू को देखा।


फिर धीरे से बोली—


“अगर मैं यहाँ रही… तो ये लोग तुम्हें मार देंगे…”


राजू बोला—


“मुझे किसी से डर नहीं लगता!”


मेहर हल्का सा मुस्कुराई।


“लेकिन मुझे लगता है…”


राजू कुछ समझ पाता उससे पहले…


मेहर ने धीरे से उसका चेहरा छुआ।


उसका हाथ बिल्कुल बर्फ जैसा ठंडा था।


फिर उसने आखिरी बार राजू को देखा…


और अगले ही पल…


उसका पूरा शरीर काले धुएँ में बदलने लगा।


राजू घबरा गया।


“मेहर… नहीं!”


लेकिन कुछ सेकंड में ही मेहर हवा में गायब हो चुकी थी…


चारों तरफ सिर्फ सन्नाटा बचा था…


और राजू घुटनों के बल जमीन पर बैठा रो रहा था मेहर के गायब होने के बाद राजू पूरी तरह बदल गया था।


अब वह पहले जैसा खुश नहीं रहता था।


पूरा दिन चुपचाप रिक्शा चलाता…

और रात होते ही उसी बरगद के पेड़ के पास चला जाता।


उसे हमेशा उम्मीद रहती—


“शायद आज मेहर वापस आ जाए…”


लेकिन हर रात उसे सिर्फ सन्नाटा मिलता।


धीरे-धीरे पूरे गाँव में राजू की बातें होने लगीं।


लोग उसे पागल कहने लगे।


कोई कहता—


“उस जिन्न ने इसका दिमाग खराब कर दिया…”


तो कोई कहता—


“एक दिन ये भी गायब हो जाएगा…”


लेकिन राजू को किसी की बातों से फर्क नहीं पड़ता था।


उसके दिल में सिर्फ मेहर थी।


एक रात बहुत तेज बारिश हो रही थी।


राजू फिर भी बरगद के पेड़ के नीचे बैठा था।


पूरा भीग चुका था…

लेकिन जाने का नाम नहीं ले रहा था।


तभी अचानक उसे वही जानी-पहचानी खुशबू महसूस हुई।


राजू तुरंत खड़ा हो गया।


उसका दिल जोर-जोर से धड़कने लगा।


धीरे-धीरे उसके सामने धुआँ बनने लगा…


और फिर उसी धुएँ से मेहर दिखाई देने लगी।


सफेद कपड़े…

लंबे बाल…

वही उदास आँखें…


राजू की आँखों में आँसू आ गए।


“मेहर…!”


मेहर हल्का सा मुस्कुराई।


“तुम आज भी मेरा इंतजार करते हो…”


राजू रोते हुए बोला—


“मैं तुम्हें कभी नहीं भूल सकता…”


मेहर उसकी तरफ देखती रही।


फिर धीरे से बोली—


“मुझे जाना होगा राजू…”


राजू घबरा गया।


“नहीं! इस बार मत जाओ!”


मेहर की आँखों से आँसू निकल पड़े।


“हमारी दुनिया अलग है…”


“तुम इंसान हो… और मैं एक जिन्न…”


राजू बोला—


“मुझे कुछ नहीं चाहिए… बस तुम चाहिए…”


मेहर रोते हुए मुस्कुराई।


“यही तो मेरी सबसे बड़ी सजा है…”


कुछ देर दोनों चुप रहे।


सिर्फ बारिश की आवाज आ रही थी।


फिर मेहर धीरे से बोली—


“अगर अगले जन्म में किस्मत ने चाहा… तो मैं सिर्फ तुम्हारी बनकर आऊँगी…”


राजू कुछ बोल पाता उससे पहले…


मेहर का शरीर फिर धीरे-धीरे धुएँ में बदलने लगा।


राजू जोर से चिल्लाया—


“मेहर… मत जाओ!”


लेकिन इस बार मेहर हमेशा के लिए जा चुकी थी…


राजू देर तक बारिश में खड़ा रोता रहा।


कहते हैं…


आज भी उस गाँव के बाहर रात के समय एक पुराना रिक्शा दिखाई देता है…


और बरगद के पेड़ के पास कभी-कभी सफेद कपड़ों में एक लड़की खड़ी नजर आती है…


जो चुपचाप किसी का इंतजार कर रही होती है

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