मजबूरी का रिश्ता
उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गांव बरईपुर में शाम धीरे-धीरे उतर रही थी। खेतों से लौटते किसानों के पैरों में मिट्टी लगी थी, बैलों की घंटियों की आवाज़ पूरे गांव में गूंज रही थी, और कच्ची गलियों में बच्चे खेलते हुए धूल उड़ाते भाग रहे थे। गांव की हवा में हमेशा की तरह मिट्टी और चूल्हे के धुएं की मिली-जुली खुशबू थी।
उसी गांव के एक छोटे से टूटे-फूटे घर में 19 साल की राधिका अपनी मां के साथ आंगन में बैठी थी। उसके हाथ में किताब थी, लेकिन आंखें बार-बार आसमान की तरफ चली जाती थीं। राधिका का सपना था कि वो पढ़-लिखकर शहर जाए, नौकरी करे, और अपने मां-बाप का सहारा बने।
लेकिन गांव में लड़कियों के सपनों की कीमत बहुत कम होती है। यहां बेटियों को जल्दी शादी करके विदा कर देना ही सबसे बड़ा फर्ज माना जाता था।
राधिका के पिता रामस्वरूप गरीब किसान थे। कुछ बीघा जमीन थी, लेकिन पिछले दो साल से फसल खराब हो रही थी। ऊपर से गांव के साहूकार का कर्ज दिन-ब-दिन बढ़ता जा रहा था।
उस रात घर के अंदर अजीब सा सन्नाटा था।
रामस्वरूप चुपचाप बैठे बीड़ी पी रहे थे।
उनकी पत्नी कमला बार-बार घबराई नजरों से उनकी तरफ देख रही थी।
“क्या बात है जी? सुबह से परेशान लग रहे हो…” कमला ने धीमे स्वर में पूछा।
रामस्वरूप ने गहरी सांस ली।
“आज चौधरी हरिराम घर आए थे…”
इतना सुनते ही कमला का चेहरा उतर गया।
चौधरी हरिराम गांव का सबसे अमीर आदमी था। उसके पास कई खेत, ट्रैक्टर, और पैसे की कोई कमी नहीं थी। लेकिन उसकी उम्र करीब 40 साल थी। उसका स्वभाव इतना कठोर था कि गांव के लोग भी उससे डरते थे।
कमला ने कांपती आवाज़ में पूछा,
“फिर… क्या कह रहे थे?”
रामस्वरूप कुछ पल चुप रहे, फिर बोले,
“वो राधिका का रिश्ता मांग रहे थे…”
कमला के हाथ से पानी का गिलास गिर गया।
“क्या…? लेकिन वो तो राधिका से दुगनी उम्र के हैं!”
रामस्वरूप ने आंखें झुका लीं।
“मुझे सब पता है… लेकिन अगर ये रिश्ता नहीं किया, तो वो हमारा कर्ज दोगुना कर देगा। खेत भी छीन लेगा…”
कमला की आंखों में आंसू आ गए।
“लेकिन हमारी बेटी की जिंदगी बर्बाद हो जाएगी…”
घर के बाहर खड़ी राधिका ये सारी बातें सुन चुकी थी।
उसके पैरों तले जमीन खिसक गई।
उसकी आंखों से आंसू बहने लगे।
उसे ऐसा लगा जैसे किसी ने उसके सारे सपनों का गला घोंट दिया हो।
उस रात राधिका पूरी रात सो नहीं पाई।
कभी वो अपनी किताबों को देखती…
कभी दीवार पर टंगी भगवान की तस्वीर को।
उसके मन में सिर्फ एक सवाल था—
“क्या गरीब घर में पैदा होना इतना बड़ा गुनाह है?”
अगली सुबह गांव में खबर फैल चुकी थी कि चौधरी हरिराम की शादी राधिका से तय हो गई है।
कुछ औरतें ताने मार रही थीं—
“अरे लड़की की किस्मत खुल गई… इतना बड़ा घर मिलेगा…”
तो कुछ लोग धीरे-धीरे अफसोस भी जता रहे थे।
लेकिन किसी में इतनी हिम्मत नहीं थी कि चौधरी हरिराम के खिलाफ कुछ बोल सके।
राधिका पूरे दिन चुप रही।
उसने खाना तक नहीं खाया।
शाम को उसकी सबसे अच्छी सहेली पूजा उससे मिलने आई।
“राधिका, ये सब क्या सुन रही हूं मैं?”
राधिका की आंखें भर आईं।
“मेरी शादी करवा रहे हैं… उस आदमी से… जो मेरे पापा से थोड़ा ही छोटा है…”
पूजा सन्न रह गई।
“तू मना कर दे!”
राधिका हल्की सी कड़वी हंसी हंस पड़ी।
“गरीब लड़कियों की जिंदगी में ‘ना’ बोलने का हक कहां होता है?”
पूजा ने उसका हाथ पकड़ा।
“तू भाग चल यहां से…”
लेकिन राधिका ने सिर हिला दिया।
“अगर मैं भाग गई, तो चौधरी मेरे परिवार को बर्बाद कर देगा…”
इतना कहते-कहते उसकी आवाज टूट गई।
गांव में शादी की तैयारियां शुरू हो चुकी थीं।
घर के बाहर टेंट लगने लगे।
ढोल वाले बुक हो गए।
औरतें गीत गाने लगीं।
लेकिन उस घर में सिर्फ एक इंसान था जिसकी दुनिया उजड़ रही थी—
राधिका।
शादी से एक दिन पहले रात में राधिका छत पर अकेली बैठी थी।
आसमान में पूरा चांद था।
उसकी आंखों में आंसू थे।
वो धीरे से खुद से बोली—
“काश… मैं लड़का पैदा हुई होती…”
उसी समय नीचे से उसके पिता की आवाज आई—
“राधिका… नीचे आ जा बेटा…”
उसने जल्दी से आंसू पोंछे और नीचे चली गई।
कमरे में चौधरी हरिराम बैठा था।
सफेद कुर्ता, मोटी मूंछें, भारी शरीर… और आंखों में अजीब सा घमंड।
राधिका डरकर नीचे देखने लगी।
हरिराम उसे ऊपर से नीचे तक घूरते हुए बोला—
“कल से तुम इस गांव की सबसे अमीर घर की बहू बन जाओगी… खुश रहना सीख लो।”
उसकी आवाज में प्यार नहीं… हुक्म था।
राधिका के दिल में डर बैठ गया।
उसे पहली बार एहसास हुआ कि उसकी शादी नहीं हो रही…
बल्कि उसे किसी सौदे की तरह किसी के हाथों बेच दिया गया है।
उस रात राधिका बहुत रोई।
इतना रोई कि उसकी आंखें सूज गईं।
लेकिन अगले दिन सुबह…
उसकी जिंदगी हमेशा के लिए बदलने वाली थी सुबह का समय था।
पूरा गांव शादी की तैयारियों में लगा हुआ था।
कच्ची गलियों में रंग-बिरंगी झालरें लटक रही थीं, घर के बाहर बड़े-बड़े बर्तन चढ़ चुके थे, और औरतों के गीतों की आवाज़ दूर तक सुनाई दे रही थी।
लेकिन उस शोर और खुशी के बीच एक कमरा ऐसा भी था जहां सिर्फ सन्नाटा था।
राधिका अपने कमरे के कोने में चुपचाप बैठी थी।
उसकी आंखें पूरी रात रोने की वजह से लाल हो चुकी थीं।
हाथों में लगी मेहंदी सूख चुकी थी, लेकिन उसके दिल के अंदर डर और दर्द अभी भी ताजा था।
कमला उसके बालों में तेल लगाते हुए खुद भी रो रही थी।
“बेटी… हमें माफ कर देना…”
राधिका ने मां की तरफ देखा।
उसकी आंखों में शिकायत नहीं थी… बस टूटा हुआ दर्द था।
“मां… अगर हमारे पास पैसे होते… तो क्या मेरी शादी भी मेरी उम्र के लड़के से होती?”
कमला कुछ बोल नहीं पाई।
उसने बस राधिका को गले से लगा लिया और फूट-फूटकर रोने लगी।
नीचे आंगन में लोग हंस रहे थे, खाना बना रहे थे, ढोल बज रहे थे…
लेकिन ऊपर उस कमरे में एक लड़की की पूरी जिंदगी खत्म हो रही थी।
दोपहर तक बारात आने की खबर फैल गई।
गांव के बच्चे सड़क की तरफ भागने लगे।
औरतें जल्दी-जल्दी तैयार होने लगीं।
राधिका को लाल रंग का भारी लहंगा पहनाया गया।
इतना भारी कि वो ठीक से चल भी नहीं पा रही थी।
उसके माथे पर बड़ा सा सिंदूरी टीका लगाया गया, गले में नकली सोने का हार पहनाया गया, और चेहरे पर इतना मेकअप कि उसकी मासूमियत कहीं छिप गई।
आईने में खुद को देखकर उसे खुद पर तरस आ रहा था।
उसे लग रहा था जैसे वो दुल्हन नहीं… किसी बलि के लिए सजाई जा रही हो।
शाम होते-होते गांव के बाहर से बैंड-बाजे की आवाज आने लगी।
“बारात आ गई… बारात आ गई!”
पूरा गांव दौड़ पड़ा।
राधिका का दिल जोर-जोर से धड़कने लगा।
वो खिड़की के पास गई और धीरे से बाहर झांका।
घोड़ी पर बैठा चौधरी हरिराम दूर से ही दिखाई दे रहा था।
सफेद शेरवानी, सिर पर साफा, मोटी मूंछें… और चेहरे पर घमंड भरी मुस्कान।
उसकी उम्र साफ नजर आ रही थी।
चेहरे पर हल्की झुर्रियां थीं, बालों में सफेदी झलक रही थी।
राधिका का गला सूख गया।
उसने धीरे से आंखें बंद कर लीं।
उसे लगा जैसे उसकी सांस रुक जाएगी।
उसी समय उसकी सहेली पूजा दौड़ते हुए कमरे में आई।
“राधिका… अभी भी वक्त है… चल भाग चलते हैं यहां से…”
राधिका ने कांपती आवाज में कहा,
“कहां जाएंगे पूजा? दुनिया बहुत बड़ी है… लेकिन गरीब लड़की के लिए कहीं जगह नहीं होती…”
पूजा की आंखें भर आईं।
नीचे से आवाज आई—
“दुल्हन को नीचे लाओ!”
राधिका के कदम कांपने लगे।
कमला और कुछ औरतें उसे पकड़कर नीचे मंडप तक लेकर गईं।
मंडप में चारों तरफ लोग बैठे थे।
सबकी निगाहें राधिका पर थीं।
लेकिन किसी ने उसके चेहरे का डर नहीं देखा।
हरिराम उसे देखकर मुस्कुरा रहा था।
उस मुस्कान में अपनापन नहीं… जीत का एहसास था।
पंडित मंत्र पढ़ने लगे।
राधिका चुपचाप बैठी रही।
जब वरमाला का समय आया, तो उसके हाथ कांपने लगे।
हरिराम ने झुककर खुद ही माला अपने गले में डाल ली और फिर जोर से हंस पड़ा।
बारातियों ने ताली बजाई।
राधिका की आंखें भर आईं।
फेरे शुरू हुए।
हर फेरे के साथ उसे लग रहा था जैसे वो अपने सपनों से दूर होती जा रही है।
उसकी पढ़ाई…
उसकी हंसी…
उसके छोटे-छोटे सपने…
सब आग में जल रहे थे।
फेरों के बाद सिंदूर भरने की रस्म आई।
हरिराम ने उसकी मांग में सिंदूर भरा।
राधिका की आंखों से आंसू बह निकले।
लोग बोले—
“अरे दुल्हन तो खुशी से रो रही है…”
लेकिन वो खुशी नहीं थी।
वो मजबूरी थी।
रात को विदाई का समय आ गया।
कमला अपनी बेटी से लिपटकर रो रही थी।
रामस्वरूप भी पहली बार फूट-फूटकर रो पड़े।
“बेटी… हमें माफ कर देना…”
राधिका ने अपने पिता के आंसू देखे तो उसका दिल टूट गया।
उसने खुद को संभालते हुए कहा,
“आप रोइए मत पिताजी… शायद यही मेरी किस्मत है…”
उसकी आवाज में इतना दर्द था कि वहां खड़े कई लोगों की आंखें नम हो गईं।
लेकिन चौधरी हरिराम के चेहरे पर कोई फर्क नहीं पड़ा।
कुछ देर बाद राधिका को गाड़ी में बैठा दिया गया।
गाड़ी धीरे-धीरे गांव से दूर जाने लगी।
राधिका खिड़की से अपने घर को आखिरी बार देख रही थी।
वो घर जहां उसने बचपन बिताया…
जहां उसने सपने देखे…
जहां वो हंसती थी…
आज वो सब पीछे छूट रहा था।
रास्ते भर हरिराम चुप बैठा रहा।
कुछ देर बाद उसने राधिका की तरफ देखकर कहा—
“अब रोना बंद करो। चौधरी घर की बहुएं ज्यादा आंसू नहीं बहातीं।”
उसकी आवाज सख्त थी।
राधिका डर गई।
करीब एक घंटे बाद गाड़ी एक बड़े हवेलीनुमा घर के सामने रुकी।
ऊंची दीवारें…
बड़ा लोहे का गेट…
अंदर कई नौकर…
राधिका ने ऐसा घर पहली बार देखा था।
लेकिन उस हवेली को देखकर उसे खुशी नहीं हुई।
उसे वो हवेली किसी जेल जैसी लग रही थी।
अंदर पहुंचते ही एक बूढ़ी औरत सामने आई।
वो हरिराम की मां थी—
शकुंतला देवी।
उनकी आंखें बहुत तेज थीं।
उन्होंने राधिका को ऊपर से नीचे तक देखा और बोलीं—
“सुन लड़की… ये कोई गरीब का घर नहीं है। यहां हमारे नियम से रहना होगा।”
राधिका ने डरते हुए सिर झुका लिया।
रात काफी हो चुकी थी।
नौकरानी उसे एक बड़े कमरे में छोड़ गई।
कमरे में बड़ा पलंग, भारी परदे, और महंगे फर्नीचर थे।
लेकिन राधिका का दिल घबरा रहा था।
उसके हाथ कांप रहे थे।
उसे डर लग रहा था कि आगे क्या होगा।
कुछ देर बाद दरवाजा धीरे से खुला।
चौधरी हरिराम कमरे के अंदर आया।
उसके कदमों की आवाज सुनते ही राधिका का दिल जोर-जोर से धड़कने लगा कमरे का दरवाजा धीरे-धीरे बंद हुआ।
राधिका का दिल इतनी तेज धड़क रहा था कि उसे खुद अपनी सांसों की आवाज सुनाई दे रही थी।
चौधरी हरिराम भारी कदमों से उसके सामने आकर खड़ा हो गया।
कमरे में हल्की पीली रोशनी जल रही थी।
बाहर हवेली के बड़े आंगन में कहीं दूर कुत्तों के भौंकने की आवाज आ रही थी।
राधिका घबराकर पलंग के कोने में बैठ गई।
उसके हाथ कांप रहे थे।
हरिराम कुछ देर तक उसे घूरता रहा।
फिर धीरे से बोला—
“अब तुम इस घर की बहू हो… और मेरी पत्नी भी। इसलिए यहां वही होगा जो मैं चाहूंगा।”
उसकी आवाज में ऐसा भारीपन था कि राधिका का डर और बढ़ गया।
उसने नजरें नीचे कर लीं।
हरिराम ने उसके पास बैठते हुए कहा—
“मैंने तुम्हें कोई कमी नहीं दी। गरीब घर से निकालकर इस हवेली में लाया हूं। इसलिए यहां सवाल पूछने की आदत मत रखना।”
राधिका चुप रही।
उसकी आंखों से आंसू धीरे-धीरे बहने लगे।
हरिराम ने पहली बार उसके आंसू देखकर हल्का सा गुस्सा दिखाया।
“रोना बंद करो! मुझे रोती हुई औरतें पसंद नहीं।”
राधिका ने जल्दी से अपने आंसू पोंछ लिए।
उस रात राधिका शायद ही एक पल के लिए सो पाई।
सुबह सूरज निकलने से पहले ही दरवाजे पर जोर-जोर से दस्तक होने लगी।
“बहू! अभी तक सो रही हो क्या?”
ये शकुंतला देवी की आवाज थी।
राधिका घबराकर उठी और जल्दी से दरवाजा खोला।
शकुंतला देवी ने उसे सिर से पैर तक देखा।
“हमारे घर की बहुएं सूरज निकलने के बाद नहीं उठतीं। जल्दी नीचे आओ, बहुत काम पड़ा है।”
राधिका तुरंत नीचे चली गई।
हवेली बहुत बड़ी थी।
इतनी बड़ी कि उसे रास्ते तक याद नहीं हो रहे थे।
नीचे रसोई में पहले से तीन नौकरानियां काम कर रही थीं।
लेकिन फिर भी शकुंतला देवी ने सारा काम राधिका को पकड़ाना शुरू कर दिया।
“ये आटा गूंथो…”
“चाय बनाओ…”
“बर्तन साफ करो…”
राधिका ने जिंदगी में इतना काम कभी नहीं किया था।
उसके हाथ दर्द करने लगे।
भारी गहनों और साड़ी में काम करना उसके लिए और मुश्किल हो रहा था।
लेकिन कोई उसकी परेशानी नहीं समझ रहा था।
दोपहर तक वो पूरी तरह थक चुकी थी।
उसी समय हवेली के बाहर से एक लड़की की आवाज आई—
“बड़े भैया घर पर हैं?”
राधिका ने मुड़कर देखा।
करीब 22-23 साल की एक खूबसूरत लड़की दरवाजे पर खड़ी थी।
साफ-सुथरे कपड़े, आंखों में आत्मविश्वास, और चेहरे पर हल्की मुस्कान।
वो थी निशा — हरिराम की छोटी बहन।
निशा शहर में पढ़ाई करती थी और गांव कम ही आती थी।
उसने जैसे ही राधिका को देखा, उसके चेहरे की मुस्कान हल्की पड़ गई।
“ये भाभी हैं?”
शकुंतला देवी बोलीं—
“हां, तुम्हारे भैया की नई दुल्हन।”
निशा कुछ पल चुप रही।
फिर धीरे से राधिका के पास आई।
“तुम्हारा नाम?”
“रा… राधिका…”
निशा ने उसकी डरी हुई आंखें देख ली थीं।
उसे समझ आ गया कि इस लड़की की शादी उसकी मर्जी से नहीं हुई।
लेकिन वो उस समय कुछ नहीं बोली।
शाम को हरिराम खेतों से वापस लौटा।
पूरा घर अचानक खामोश हो गया।
नौकर सीधे खड़े हो गए।
शकुंतला देवी का चेहरा भी बदल गया।
राधिका ने पहली बार महसूस किया कि इस घर में हर कोई हरिराम से डरता है।
खाना खाते समय हरिराम ने राधिका की तरफ देखा।
“दाल में नमक कम है।”
बस इतना सुनते ही शकुंतला देवी गुस्से से चिल्ला पड़ीं—
“तुमसे इतना भी काम ठीक से नहीं होता? हमारे घर की इज्जत मिट्टी में मिला दोगी!”
राधिका डर गई।
उसने जल्दी से माफी मांगी।
लेकिन हरिराम बिना कुछ बोले खाना छोड़कर चला गया।
रात को राधिका अकेली छत पर खड़ी थी।
हवा चल रही थी।
दूर गांव में कहीं शादी का गीत सुनाई दे रहा था।
उसकी आंखें फिर भर आईं।
उसे अपना पुराना घर याद आने लगा।
मां की आवाज…
पिता का प्यार…
पूजा के साथ की हंसी…
सब कुछ जैसे बहुत दूर छूट गया था।
उसी समय पीछे से किसी ने धीरे से कहा—
“तुम खुश नहीं हो ना?”
राधिका ने मुड़कर देखा।
वो निशा थी।
राधिका कुछ नहीं बोली।
लेकिन उसकी आंखों के आंसू सब कह चुके थे।
निशा उसके पास आकर खड़ी हो गई।
“मुझे पहले ही समझ आ गया था… ये शादी मजबूरी में हुई है।”
इतना सुनते ही राधिका रो पड़ी।
“मैं क्या करती दीदी…? अगर मना करती तो मेरे पिताजी बर्बाद हो जाते…”
निशा चुपचाप उसकी बातें सुनती रही।
फिर उसने धीरे से कहा—
“मेरे भैया पहले ऐसे नहीं थे…”
राधिका ने हैरानी से उसकी तरफ देखा।
निशा बोली—
“जब भैया 25 साल के थे, तब वो एक लड़की से प्यार करते थे। शादी भी होने वाली थी… लेकिन उस लड़की की अचानक मौत हो गई। उसके बाद भैया पूरी तरह बदल गए। गुस्सैल… कठोर… और अकेले।”
राधिका ध्यान से सुन रही थी।
“दादी और मां ने कई रिश्ते दिखाए, लेकिन भैया ने कभी शादी नहीं की। फिर अचानक इस बार तुम्हारे लिए हां बोल दी…”
राधिका के मन में अजीब सा डर बैठ गया।
क्या वो सिर्फ एक जरूरत थी?
एक अकेले आदमी की जिंदगी भर की खामोशी भरने का साधन?
निशा ने उसका हाथ पकड़ा।
“डरो मत। मैं हूं तुम्हारे साथ।”
इतने दिनों में पहली बार किसी ने उससे प्यार से बात की थी।
राधिका की आंखें फिर भर आईं।
अगले कुछ दिन ऐसे ही बीतने लगे।
सुबह से रात तक काम…
हर बात पर टोका जाना…
हर समय डर में जीना…
हरिराम उससे ज्यादा बात नहीं करता था।
लेकिन जब भी करता, उसकी आवाज में आदेश होता।
एक दिन दोपहर में राधिका आंगन में कपड़े सुखा रही थी।
तभी हवेली के बाहर कुछ गांव की औरतें खड़ी होकर बातें करने लगीं।
“सुना है चौधरी ने अपनी बेटी की उम्र की लड़की से शादी की है…”
“पैसों के दम पर सब कर लिया…”
“बेचारी लड़की…”
राधिका ने सब सुन लिया।
उसका दिल और टूट गया।
रात को वो खाना लेकर हरिराम के कमरे में गई।
हरिराम खामोशी से बैठा था।
उसने अचानक पूछा—
“गांव वाले क्या बातें कर रहे थे?”
राधिका डर गई।
“म… मुझे नहीं पता…”
हरिराम ने गुस्से से मेज पर हाथ मारा।
“झूठ मत बोलो!”
राधिका कांपने लगी।
“वो… लोग बस ऐसे ही बातें कर रहे थे…”
हरिराम की आंखों में गुस्सा भर गया।
“इस गांव में कोई मेरी इज्जत पर उंगली नहीं उठा सकता।”
उसकी आवाज इतनी तेज थी कि राधिका डरकर पीछे हट गई।
कुछ पल बाद हरिराम शांत हुआ।
उसने पहली बार गौर से राधिका का डरा हुआ चेहरा देखा।
उसकी आंखों में डर साफ दिखाई दे रहा था।
हरिराम कुछ सेकंड तक उसे देखता रहा…
फिर धीरे से बोला—
“मुझसे इतना डरती हो?”
राधिका के होंठ कांपने लगे।
लेकिन वो कुछ बोल नहीं पाई।
कमरे में गहरा सन्नाटा छा गया।
और उसी सन्नाटे के बीच…
हरिराम पहली बार खुद के अंदर भी कुछ टूटता हुआ महसूस कर रहा था उस रात के बाद हवेली का माहौल पहले जैसा नहीं रहा।
राधिका ने पहली बार महसूस किया कि चौधरी हरिराम के अंदर कहीं न कहीं कोई ऐसा हिस्सा भी है… जो पूरी तरह पत्थर नहीं बना।
लेकिन डर अभी भी खत्म नहीं हुआ था।
हरिराम का गुस्सा, उसकी भारी आवाज, पूरे घर पर उसका दबदबा — ये सब राधिका को हर समय सहमा कर रखते थे।
सुबह का समय था।
हवेली के बड़े आंगन में तुलसी के पास दिया जल रहा था।
नौकर इधर-उधर काम में लगे थे।
शकुंतला देवी पूजा खत्म करके बैठी ही थीं कि तभी गांव की दो औरतें वहां आ पहुंचीं।
“राम-राम चौधराइन…”
“राम-राम…” शकुंतला देवी ने जवाब दिया।
दोनों औरतें बैठ गईं और धीरे-धीरे बातें करने लगीं।
“नई बहू कहां है?”
“रसोई में होगी…”
फिर उनमें से एक औरत मुस्कुराकर बोली—
“वैसे चौधरी साहब ने तो कमाल कर दिया… इतनी छोटी लड़की से शादी!”
दूसरी औरत हंस पड़ी।
“अरे पैसे वालों के लिए सब माफ है…”
इतना सुनते ही शकुंतला देवी का चेहरा गुस्से से लाल हो गया।
“अपनी जुबान संभाल के बात करो! हमारी बहू हमारे घर की इज्जत है!”
दोनों औरतें तुरंत चुप हो गईं।
लेकिन रसोई में खड़ी राधिका सब सुन चुकी थी।
उसके दिल में जैसे किसी ने सुई चुभा दी हो।
उसे हमेशा यही एहसास कराया जा रहा था कि उसकी शादी कोई सामान्य रिश्ता नहीं… बल्कि गांव भर की चर्चा है।
दोपहर में हरिराम खेतों पर चला गया।
राधिका अकेली आंगन में बैठकर सब्जी काट रही थी।
उसी समय निशा उसके पास आकर बैठ गई।
“तुम्हें यहां अच्छा नहीं लगता ना?”
राधिका हल्का सा मुस्कुराई, लेकिन वो मुस्कान नकली थी।
“कुछ जगहें इंसान की नहीं होतीं दीदी… बस किस्मत उसे वहां ले आती है।”
निशा उसकी बातें सुनकर चुप हो गई।
फिर धीरे से बोली—
“अगर तुम्हें मौका मिले… तो क्या तुम वापस अपने पुराने जीवन में जाना चाहोगी?”
राधिका कुछ पल सोचती रही।
उसकी आंखों में अपने पुराने घर की तस्वीर घूम गई।
मिट्टी का आंगन…
मां की आवाज…
पिता का प्यार…
पूजा के साथ हंसी…
लेकिन अगले ही पल उसे अपने पिता का झुका हुआ चेहरा याद आया।
“अब मेरा पुराना जीवन कहां बचा है दीदी…”
उसकी आवाज भर्रा गई।
शाम को अचानक हवेली में कुछ मेहमान आए।
गांव के बड़े लोग थे।
सब लोग बैठक में बैठे बातें कर रहे थे।
राधिका को चाय लेकर अंदर भेजा गया।
जैसे ही वो कमरे में गई, सबकी नजरें उस पर टिक गईं।
कुछ लोग धीरे-धीरे मुस्कुरा रहे थे।
कुछ अजीब नजरों से उसे देख रहे थे।
एक बूढ़ा आदमी हंसते हुए बोला—
“चौधरी साहब, आपकी किस्मत तो जवान हो गई!”
पूरा कमरा ठहाके से गूंज उठा।
राधिका का चेहरा शर्म और अपमान से लाल हो गया।
लेकिन हरिराम चुप बैठा रहा।
उसकी आंखें अचानक सख्त हो गईं।
उसने धीमी लेकिन भारी आवाज में कहा—
“ये मेरी पत्नी है… कोई मजाक नहीं।”
कमरे में तुरंत सन्नाटा छा गया।
राधिका हैरानी से हरिराम को देखने लगी।
पहली बार किसी ने उसके सम्मान के लिए आवाज उठाई थी।
रात को खाना खाते समय भी राधिका का मन शांत नहीं था।
उसे समझ नहीं आ रहा था कि हरिराम आखिर कैसा इंसान है।
कभी पत्थर जैसा कठोर…
तो कभी अचानक उसकी इज्जत के लिए खड़ा हो जाना।
रात काफी हो चुकी थी।
राधिका अपने कमरे में बैठी खिड़की से बाहर देख रही थी।
तभी अचानक हवेली के बाहर जोर-जोर से आवाजें आने लगीं।
“चौधरी साहब बाहर आइए!”
पूरा घर घबरा गया।
हरिराम तुरंत बाहर गया।
राधिका भी डरते हुए दरवाजे तक पहुंची।
बाहर गांव का साहूकार और उसके आदमी खड़े थे।
साहूकार गुस्से में चिल्ला रहा था—
“रामस्वरूप ने अभी तक मेरा पूरा कर्ज नहीं लौटाया!”
राधिका का दिल बैठ गया।
वो तुरंत बाहर भागी।
“मेरे पिताजी…?”
साहूकार ने उसे घूरते हुए कहा—
“तुम्हारे बाप ने खेत गिरवी रखे थे। अब पैसे नहीं दे पा रहा। कल तक पैसे नहीं मिले तो घर छीन लूंगा!”
राधिका की आंखों में आंसू आ गए।
“नहीं! ऐसा मत कीजिए…”
साहूकार हंस पड़ा।
“गरीब आदमी की बेटी हो… रोने के अलावा आता ही क्या है?”
इतना सुनते ही हरिराम आगे बढ़ा।
उसकी आंखों में खतरनाक गुस्सा था।
“जुबान संभाल के बात कर।”
साहूकार थोड़ा सहम गया।
हरिराम ने जेब से कागज निकाला और उसके सामने फेंक दिया।
“रामस्वरूप का पूरा कर्ज मैं चुका चुका हूं। अब उनका कोई कर्ज बाकी नहीं।”
राधिका स्तब्ध रह गई।
“क्या…?”
साहूकार गुस्से में कागज देखकर चुप हो गया।
कुछ देर बाद वो अपने आदमियों के साथ वहां से चला गया।
राधिका की आंखों से आंसू बहने लगे।
उसे विश्वास नहीं हो रहा था।
हरिराम ने उसके पिता का कर्ज चुका दिया था।
वो कांपती आवाज में बोली—
“आपने… ये सब क्यों किया?”
हरिराम ने उसकी तरफ देखा।
“अब वो मेरे भी परिवार हैं।”
इतना कहकर वो अंदर चला गया।
लेकिन राधिका वहीं खड़ी रह गई।
उसके दिल में पहली बार हरिराम के लिए सिर्फ डर नहीं… कुछ और भी महसूस हुआ।
शायद सम्मान।
लेकिन उसी रात एक ऐसी बात हुई जिसने राधिका को फिर से अंदर तक हिला दिया।
रात के करीब बारह बजे थे।
पूरा घर सो चुका था।
राधिका की अचानक नींद खुली।
उसे लगा जैसे बाहर कोई रो रहा हो।
धीमी… दर्द भरी आवाज।
वो डरते हुए कमरे से बाहर निकली।
आवाज हवेली के पुराने बंद हिस्से से आ रही थी।
वो धीरे-धीरे वहां पहुंची।
दरवाजा थोड़ा खुला हुआ था।
अंदर हल्की मोमबत्ती जल रही थी।
राधिका ने झांककर देखा…
और उसका दिल जोर से धड़क उठा।
अंदर चौधरी हरिराम बैठा था।
उसके हाथ में एक पुरानी तस्वीर थी।
और उसकी आंखों से आंसू बह रहे थे राधिका दरवाजे के बाहर खड़ी कांप रही थी।
उसने कभी सोचा भी नहीं था कि चौधरी हरिराम जैसा कठोर आदमी… रो भी सकता है।
कमरे के अंदर हल्की मोमबत्ती जल रही थी।
दीवारों पर पुरानी तस्वीरें टंगी थीं।
कमरा ऐसा लग रहा था जैसे कई सालों से बंद पड़ा हो।
हरिराम जमीन पर बैठा था।
उसके हाथ में एक पुरानी तस्वीर थी, जिसे वो बार-बार देख रहा था।
उसकी आंखों से लगातार आंसू बह रहे थे।
राधिका की सांसें तेज हो गईं।
वो समझ नहीं पा रही थी कि क्या करे।
तभी अचानक हरिराम की नजर दरवाजे पर पड़ी।
उसने जल्दी से आंसू पोंछे और गुस्से में खड़ा हो गया।
“तुम यहां क्या कर रही हो?”
उसकी भारी आवाज सुनकर राधिका डर गई।
“वो… मुझे आवाज सुनाई दी…”
हरिराम कुछ पल चुप रहा।
फिर उसने तस्वीर को मेज पर उल्टा रख दिया।
“यहां आने की जरूरत नहीं थी।”
राधिका वापस जाने लगी।
लेकिन तभी उसकी नजर उस तस्वीर पर पड़ गई।
तस्वीर में एक खूबसूरत लड़की थी।
साधारण सलवार-कमीज, चेहरे पर मासूम मुस्कान, और आंखों में चमक।
राधिका समझ गई…
यही वो लड़की थी जिससे हरिराम प्यार करता था।
कमरे में कुछ पल के लिए गहरा सन्नाटा छा गया।
फिर हरिराम धीमी आवाज में बोला—
“उसका नाम सुजाता था…”
राधिका रुक गई।
हरिराम धीरे-धीरे कुर्सी पर बैठ गया।
“मैं उससे बहुत प्यार करता था। पूरे गांव में हमारी शादी की बातें हो चुकी थीं…”
उसकी आवाज भारी हो गई।
“लेकिन शादी से दस दिन पहले… नदी पार करते समय नाव पलट गई। वो… हमेशा के लिए चली गई…”
राधिका की आंखें भर आईं।
हरिराम आगे बोला—
“उस दिन के बाद मुझे हर रिश्ते से नफरत हो गई। लोगों से… प्यार से… यहां तक कि खुद से भी…”
उसकी आंखों में दर्द साफ दिखाई दे रहा था।
“मां ने हजार बार शादी के लिए कहा… लेकिन मैं तैयार नहीं हुआ। फिर एक दिन तुम्हारे पिता मेरे सामने हाथ जोड़कर खड़े थे…”
राधिका का दिल धड़क उठा।
“उनकी आंखों में वही डर था… जो कभी मेरे अंदर था। उस दिन पता नहीं क्यों मैंने हां कह दी…”
राधिका चुपचाप सुनती रही।
उसने पहली बार हरिराम के अंदर छिपे अकेले इंसान को महसूस किया।
एक ऐसा आदमी जो बाहर से कठोर था… लेकिन अंदर से पूरी तरह टूटा हुआ।
उस रात दोनों देर तक चुप बैठे रहे।
पहली बार उनके बीच डर नहीं… खामोशी थी।
अगली सुबह हवेली में अजीब हलचल थी।
गांव की कुछ औरतें आई हुई थीं।
सब धीरे-धीरे बातें कर रही थीं।
तभी राधिका ने सुना—
“सुना है चौधरी साहब रात-रात भर पुराने कमरे में जाते हैं…”
“अरे नई बहू ज्यादा दिन टिकेगी नहीं वहां…”
राधिका को ये बातें अच्छी नहीं लगीं।
लेकिन वो चुप रही।
अब धीरे-धीरे हवेली में उसका मन थोड़ा बदलने लगा था।
निशा उससे खुलकर बातें करने लगी थी।
नौकर भी अब उससे डरने के बजाय सम्मान से पेश आने लगे थे।
लेकिन शकुंतला देवी अभी भी बहुत सख्त थीं।
उन्हें लगता था कि राधिका अभी भी इस बड़े घर के लायक नहीं है।
एक दिन दोपहर में हवेली में बड़े मेहमान आने वाले थे।
शकुंतला देवी ने राधिका से कहा—
“आज कोई गलती मत करना। गांव के बड़े लोग आएंगे।”
राधिका पूरे मन से तैयारी करने लगी।
उसने खाना बनाया, घर सजाया, और सब काम संभाला।
शाम तक हवेली मेहमानों से भर गई।
गांव के प्रधान, बड़े किसान, और कई रिश्तेदार आए हुए थे।
सब लोग चौधरी हरिराम की नई पत्नी को देखने में ज्यादा दिलचस्पी ले रहे थे।
तभी एक आदमी ने हंसते हुए कहा—
“चौधरी साहब, अब तो आपकी किस्मत जवान हो गई।”
पूरा कमरा हल्के ठहाके से गूंज उठा।
लेकिन इस बार हरिराम का चेहरा गुस्से से सख्त हो गया।
उसने सबके सामने कहा—
“मेरी पत्नी के बारे में कोई गलत मजाक मुझे पसंद नहीं।”
कमरे में तुरंत खामोशी छा गई।
राधिका ने पहली बार महसूस किया कि हरिराम अब सिर्फ उसे अपने घर की बहू नहीं… अपनी इज्जत मानने लगा है।
रात को सभी मेहमान चले गए।
राधिका आंगन में अकेली बैठी थी।
चांदनी पूरे आंगन में फैली हुई थी।
तभी हरिराम धीरे-धीरे उसके पास आकर बैठ गया।
कुछ देर दोनों चुप रहे।
फिर हरिराम बोला—
“तुम मुझसे नफरत करती हो ना?”
राधिका ने उसकी तरफ देखा।
उसकी आंखों में पहली बार घमंड नहीं था।
बस एक डर था।
राधिका ने धीरे से कहा—
“शुरू में बहुत डर लगता था…”
हरिराम ने सिर झुका लिया।
“मुझे लोगों से बात करना नहीं आता राधिका। जिंदगी ने मुझे बहुत जल्दी बदल दिया।”
राधिका उसकी बातें सुनती रही।
“लेकिन मैं कोशिश कर रहा हूं… कि तुम्हें कभी दुख ना दूं।”
राधिका की आंखें भर आईं।
उसे पहली बार लगा कि शायद हर रिश्ता शुरुआत में प्यार से नहीं बनता।
कुछ रिश्ते दर्द, मजबूरी, और समय के साथ धीरे-धीरे बदलते हैं।
उसी समय हवेली के बाहर अचानक जोर-जोर से शोर होने लगा।
“आग! आग लग गई!”
पूरा घर घबरा गया।
सब लोग बाहर भागे।
हवेली के पीछे वाले गोदाम में आग लगी हुई थी।
लपटें तेजी से बढ़ रही थीं।
नौकर पानी डालने लगे।
लोग चिल्ला रहे थे।
तभी किसी ने चिल्लाकर कहा—
“अंदर बच्चा फंसा हुआ है!”
सबके होश उड़ गए।
एक नौकर का छोटा बेटा अंदर रह गया था।
कोई अंदर जाने की हिम्मत नहीं कर रहा था।
आग बहुत भयानक हो चुकी थी।
तभी अचानक हरिराम बिना कुछ सोचे आग के अंदर दौड़ पड़ा।
“नहीं!” राधिका जोर से चिल्लाई।
उसका दिल डर से कांप उठा।
कुछ मिनट ऐसे बीते जैसे पूरी जिंदगी रुक गई हो।
चारों तरफ धुआं फैल चुका था।
राधिका की आंखों से आंसू बह रहे थे।
वो बस भगवान से प्रार्थना कर रही थी।
फिर अचानक आग के बीच से हरिराम बाहर निकला।
उसकी बाहों में वो छोटा बच्चा था।
पूरा गांव हैरान रह गया।
लेकिन हरिराम बुरी तरह झुलस चुका था।
उसके हाथ और कंधे जल गए थे।
राधिका दौड़कर उसके पास पहुंची।
“आप ठीक हैं?”
पहली बार उसकी आवाज में डर से ज्यादा अपनापन था।
हरिराम दर्द में भी हल्का सा मुस्कुराया।
“मैं ठीक हूं…”
लेकिन अगले ही पल वो बेहोश होकर जमीन पर गिर पड़ा।
राधिका चीख उठी—
“चौधरी साहब…!”
और उसी चीख के साथ…
उसके दिल में पहली बार हरिराम को खो देने का डर पैदा हुआ

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