गरीब किसान की दूसरी शादी बनी सबसे बड़ी गलती – सौतेली मां का डरावना सच आया सामने
उत्तर प्रदेश के छोटे से गांव रामपुर खेड़ा में सुबह का सूरज धीरे-धीरे खेतों पर फैल रहा था।
चारों तरफ हरियाली थी, कच्ची गलियों में गायें घूम रही थीं, और गांव की औरतें सिर पर पानी के घड़े रखे कुएं से लौट रही थीं।
लेकिन उस गांव के एक घर में कई सालों से खुशियां नहीं थीं।
उस घर में रहता था 18 साल का अर्जुन अपने पिता रघुवीर के साथ।
अर्जुन की मां की मौत तब हो गई थी जब वो सिर्फ 10 साल का था।
उस दिन के बाद उसका घर घर नहीं… सिर्फ चार दीवारें बनकर रह गया था।
रघुवीर पहले बहुत हंसमुख इंसान था, लेकिन पत्नी की मौत के बाद वो अंदर से टूट गया।
धीरे-धीरे उसने शराब पीना शुरू कर दिया।
गांव वाले अक्सर कहते थे—
“बेचारा रघुवीर… अकेले आदमी की जिंदगी बड़ी मुश्किल होती है…”
अर्जुन चुपचाप सब सुनता रहता।
उसने छोटी उम्र में ही जिम्मेदारियां उठानी शुरू कर दी थीं।
सुबह खेत पर काम…
दोपहर में मजदूरी…
और रात को घर का सारा काम।
उसकी जिंदगी बस काम और थकान में गुजर रही थी।
लेकिन अर्जुन का एक सपना था—
वो पढ़-लिखकर गांव से बाहर जाना चाहता था।
उसे मशीनों और ट्रैक्टरों में बहुत दिलचस्पी थी।
जब भी गांव में कोई ट्रैक्टर खराब होता, अर्जुन उसे घंटों बैठकर ठीक करने की कोशिश करता।
गांव के लोग कहते—
“ये लड़का बड़ा होकर मैकेनिक बनेगा।”
लेकिन गरीबी इंसान के सपनों को जल्दी बड़ा नहीं होने देती।
एक शाम अर्जुन खेत से वापस घर आया तो उसने देखा कि घर के बाहर कुछ औरतें खड़ी होकर बातें कर रही थीं।
अंदर से ढोलक की हल्की आवाज आ रही थी।
अर्जुन हैरान हो गया।
वो जल्दी से अंदर गया।
अंदर उसके पिता नए कपड़े पहने बैठे थे और चेहरे पर हल्की मुस्कान थी।
अर्जुन ने पूछा—
“क्या हुआ पिताजी?”
रघुवीर कुछ देर चुप रहा, फिर बोला—
“मैंने दूसरी शादी करने का फैसला किया है…”
अर्जुन के पैरों तले जमीन खिसक गई।
“क्या…?”
रघुवीर ने नजरें झुका लीं।
“घर संभालने वाला कोई चाहिए बेटा… अकेले अब नहीं होता…”
अर्जुन कुछ नहीं बोला।
उसके दिल में अजीब सा दर्द उठने लगा।
उसे ऐसा लग रहा था जैसे कोई उसकी मां की जगह छीनने आ रहा हो।
अगले ही दिन गांव में खबर फैल गई।
रघुवीर की शादी पास के गांव की एक औरत सुनीता से तय हो गई थी।
सुनीता की उम्र करीब 32 साल थी।
उसका पति कई साल पहले मर चुका था।
लोग कहते थे कि वो बहुत चालाक और तेज औरत है।
कुछ औरतें कानाफूसी कर रही थीं—
“सुनीता सीधी नहीं है…”
“उसकी नजर रघुवीर की जमीन पर है…”
लेकिन रघुवीर किसी की बात सुनने को तैयार नहीं था।
शादी जल्दी ही हो गई।
जिस दिन सुनीता पहली बार घर में आई, पूरा गांव देखने आया।
लाल साड़ी, भारी मेकअप, तेज आंखें, और चेहरे पर बनावटी मुस्कान।
उसने घर में कदम रखते ही चारों तरफ ऐसे देखा जैसे वो घर नहीं… कोई संपत्ति हो।
अर्जुन चुपचाप एक कोने में खड़ा था।
सुनीता उसकी तरफ देखकर मुस्कुराई।
“तुम अर्जुन हो ना?”
अर्जुन ने बस सिर हिला दिया।
उस दिन से घर का माहौल बदलने लगा।
शुरुआत में सुनीता बहुत प्यार दिखाती थी।
रघुवीर के सामने वो अर्जुन को “बेटा-बेटा” कहकर बुलाती।
उसके लिए खाना बनाती।
कपड़े धोती।
रघुवीर खुश था।
उसे लग रहा था कि उसके घर में फिर से खुशियां लौट आई हैं।
लेकिन अर्जुन को कुछ अजीब लगता था।
उसे सुनीता की आंखों में सच्चाई नहीं दिखती थी।
एक रात अर्जुन पानी पीने उठा।
घर में गहरा सन्नाटा था।
तभी उसे आंगन से धीमी आवाजें सुनाई दीं।
वो धीरे-धीरे बाहर गया।
आंगन में सुनीता किसी आदमी से धीरे-धीरे बात कर रही थी।
अंधेरे की वजह से चेहरा साफ नहीं दिख रहा था।
सुनीता बोली—
“थोड़ा सब्र करो… जल्द ही सारी जमीन हमारे नाम हो जाएगी…”
अर्जुन के होश उड़ गए।
उसका दिल जोर-जोर से धड़कने लगा।
वो जल्दी से दीवार के पीछे छिप गया।
कुछ सेकंड बाद वो आदमी वहां से चला गया।
सुनीता ने चारों तरफ देखा… फिर धीरे-धीरे अंदर चली गई।
अर्जुन पूरी रात सो नहीं पाया।
उसके दिमाग में सिर्फ एक ही बात घूम रही थी—
“ये औरत आखिर चाहती क्या है?”
अगली सुबह उसने अपने पिता को सब बताने की कोशिश की।
लेकिन रघुवीर गुस्से में चिल्ला पड़ा—
“बस करो अर्जुन! तुम्हें सुनीता की खुशी देखी नहीं जाती!”
अर्जुन चुप हो गया।
उसे पहली बार एहसास हुआ कि उसके पिता अब उसकी बातों पर भरोसा नहीं करते।
धीरे-धीरे घर में तनाव बढ़ने लगा।
सुनीता छोटी-छोटी बातों पर अर्जुन की शिकायत करती।
“ये मेरी इज्जत नहीं करता…”
“मुझसे ऊंची आवाज में बात करता है…”
और हर बार रघुवीर अपने बेटे को डांट देता।
एक दिन तो हद हो गई।
रघुवीर ने गुस्से में अर्जुन को थप्पड़ मार दिया।
अर्जुन की आंखें भर आईं।
बचपन के बाद पहली बार उसके पिता ने उस पर हाथ उठाया था।
उस रात अर्जुन अकेला खेतों में जाकर बैठ गया।
आसमान में काले बादल थे।
हवा तेज चल रही थी।
उसकी आंखों में आंसू थे।
वो धीरे से बोला—
“मां… अगर तुम होती… तो ये सब कभी नहीं होता…”
उसी समय अचानक पीछे से किसी ने उसका नाम पुकारा—
“अर्जुन!”
वो घबराकर पीछे मुड़ा।
सामने गांव का बूढ़ा आदमी भोलाराम काका खड़ा था।
उनके चेहरे पर डर साफ दिखाई दे रहा था।
उन्होंने कांपती आवाज में कहा—
“बेटा… उस औरत से सावधान रहना… मैंने अपनी आंखों से कुछ ऐसा देखा है… जो तुम्हारे पिता की जान भी ले सकता है रात का समय था।
पूरा गांव गहरी नींद में डूब चुका था।
दूर कहीं कुत्तों के भौंकने की आवाज आ रही थी और खेतों के बीच झींगुरों की आवाज सन्नाटे को और डरावना बना रही थी।
अर्जुन खेत के किनारे खड़ा था।
उसकी आंखें भोलाराम काका के चेहरे पर टिकी थीं।
काका की सांसें तेज चल रही थीं।
ऐसा लग रहा था जैसे वो बहुत डर गए हों।
अर्जुन घबराकर बोला—
“क्या देखा आपने काका?”
भोलाराम काका ने पहले चारों तरफ देखा, फिर अर्जुन का हाथ पकड़कर उसे खेतों के अंदर की तरफ ले गए ताकि कोई उनकी बातें ना सुन सके।
हवा तेज चल रही थी।
सूखे पेड़ की डालियां अंधेरे में डरावनी आवाज कर रही थीं।
काका धीमी आवाज में बोले—
“आज शाम मैं गांव के बाहर वाले पुराने कुएं के पास बैठा था… तभी मैंने तुम्हारी सौतेली मां को देखा।”
अर्जुन ध्यान से सुनने लगा।
“वो अकेली नहीं थी। उसके साथ वही आदमी था जो पहले उसके घर आया करता था… नाम है महेश।”
अर्जुन का दिल जोर से धड़कने लगा।
“महेश?”
“हां… वही आदमी जिससे उसका पहले से संबंध था।”
अर्जुन के चेहरे का रंग उड़ गया।
काका आगे बोले—
“मैंने अपनी आंखों से देखा बेटा… दोनों चोरी-छिपे बातें कर रहे थे। वो कह रही थी कि बस थोड़ा समय और… फिर सारी जमीन उनके हाथ में होगी।”
अर्जुन को ऐसा लगा जैसे उसके पैरों तले जमीन खिसक गई हो।
“लेकिन… वो ऐसा क्यों करेगी?”
भोलाराम काका ने भारी सांस ली।
“क्योंकि उसे तुम्हारे बाप से प्यार नहीं… उनकी जमीन से प्यार है।”
ये सुनते ही अर्जुन की आंखों में गुस्सा भर गया।
उसे याद आने लगा कि शादी के बाद से ही सुनीता घर के सारे कागज देखने लगी थी।
हर समय पैसों की बात करती थी।
और अब तो उसने रघुवीर को गांव वालों से भी दूर करना शुरू कर दिया था।
काका ने डरते हुए कहा—
“मुझे डर है बेटा… कहीं वो तुम्हारे बाप के साथ कुछ गलत ना कर दे।”
अर्जुन का दिल बैठ गया।
उस रात वो घर लौटा तो उसके कदम भारी थे।
घर के अंदर अजीब सा सन्नाटा था।
रघुवीर शराब पीकर सो चुके थे।
लेकिन सुनीता अभी भी जाग रही थी।
वो कमरे में बैठी कुछ कागज देख रही थी।
जैसे ही अर्जुन अंदर आया, उसने जल्दी से कागज छिपा दिए।
फिर नकली मुस्कान के साथ बोली—
“इतनी रात तक कहां थे?”
अर्जुन ने पहली बार उसकी आंखों में सीधे देखा।
अब उसे उस औरत से डर नहीं… नफरत होने लगी थी।
“आपको उससे क्या?”
सुनीता का चेहरा तुरंत बदल गया।
उसकी आंखों की मिठास गायब हो गई।
“बड़ों से ऐसे बात करते हैं?”
अर्जुन बिना जवाब दिए अपने कमरे में चला गया।
लेकिन उस रात उसे नींद नहीं आई।
उसके दिमाग में सिर्फ एक सवाल घूम रहा था—
“क्या सच में ये औरत पिताजी को नुकसान पहुंचा सकती है?”
अगली सुबह घर में फिर झगड़ा शुरू हो गया।
सुनीता ने रघुवीर से शिकायत कर दी कि अर्जुन उससे बदतमीजी करता है।
रघुवीर गुस्से में चिल्ला पड़े—
“तुझे आखिर दिक्कत क्या है सुनीता से?”
अर्जुन ने गुस्से में कहा—
“क्योंकि वो अच्छी औरत नहीं है!”
इतना सुनते ही सुनीता रोने का नाटक करने लगी।
“देखिए जी… आपका बेटा मुझे इस घर से निकालना चाहता है…”
रघुवीर का गुस्सा बढ़ गया।
“बस! अगर सुनीता के खिलाफ एक शब्द और बोला… तो अच्छा नहीं होगा!”
अर्जुन चुप हो गया।
उसे समझ आ गया था कि उसके पिता पूरी तरह सुनीता के जाल में फंस चुके हैं।
दिन बीतते गए।
धीरे-धीरे सुनीता घर के सारे फैसले लेने लगी।
किस खेत में क्या बोना है…
किससे बात करनी है…
कहां पैसे खर्च होंगे…
सब कुछ वही तय करती।
रघुवीर अब पहले जैसे नहीं रहे थे।
वो हर समय या तो शराब में डूबे रहते… या सुनीता की बातों में।
एक दिन अर्जुन खेत से जल्दी लौट आया।
घर के अंदर से हंसी की आवाज आ रही थी।
वो धीरे-धीरे कमरे के पास पहुंचा।
अंदर सुनीता और वही आदमी — महेश — बैठे थे।
महेश आराम से चारपाई पर बैठा था जैसे वो इस घर का मालिक हो।
सुनीता हंसते हुए बोली—
“बस कुछ दिन और… फिर सब हमारा होगा।”
महेश बोला—
“लेकिन वो लड़का बीच में परेशानी बन सकता है।”
सुनीता की आंखें अचानक खतरनाक हो गईं।
“उसकी चिंता मत करो… पहले उसके बाप को पूरी तरह अपने कब्जे में आने दो।”
अर्जुन के शरीर में सिहरन दौड़ गई।
उसका गुस्सा अब डर में बदलने लगा था।
वो जल्दी से वहां से हट गया ताकि कोई उसे देख ना ले।
उस रात अर्जुन ने फैसला कर लिया कि अब वो चुप नहीं बैठेगा।
अगली सुबह वो गांव के स्कूल मास्टर दीनानाथ जी के पास गया।
दीनानाथ जी गांव के सबसे समझदार इंसान माने जाते थे।
अर्जुन ने उन्हें सारी बातें बता दीं।
सब सुनने के बाद दीनानाथ जी गंभीर हो गए।
“बेटा… बिना सबूत के तुम्हारे पिता तुम्हारी बात नहीं मानेंगे।”
अर्जुन की आंखें भर आईं।
“तो मैं क्या करूं मास्टर जी?”
दीनानाथ जी कुछ देर सोचते रहे।
फिर बोले—
“तुम्हें सबूत जुटाने होंगे। तभी सच सामने आएगा।”
अर्जुन ने सिर हिला दिया।
अब उसके अंदर सिर्फ एक ही लक्ष्य था—
अपने पिता को बचाना।
उस दिन के बाद अर्जुन चोरी-छिपे सुनीता पर नजर रखने लगा।
उसे पता चला कि सुनीता अक्सर रात में किसी से मिलने बाहर जाती है।
कभी पुराने कुएं के पास…
कभी गांव के बाहर वाले आम के बाग में।
एक रात अर्जुन चुपके से उसका पीछा करने लगा।
आसमान में बादल थे।
चारों तरफ अंधेरा फैला हुआ था।
सुनीता धीरे-धीरे गांव के बाहर पुराने खंडहर की तरफ जा रही थी।
अर्जुन दूर-दूर छिपते हुए उसके पीछे चल रहा था।
उसका दिल इतनी तेज धड़क रहा था कि उसे खुद डर लग रहा था कहीं आवाज बाहर ना आ जाए।
कुछ देर बाद सुनीता उस खंडहर में पहुंच गई।
अंदर पहले से महेश मौजूद था।
दोनों धीमी आवाज में बातें करने लगे।
अर्जुन टूटी दीवार के पीछे छिपकर सब सुनने लगा।
महेश बोला—
“कब तक इंतजार करेंगे?”
सुनीता हंस पड़ी।
“बहुत जल्द रघुवीर सारी जमीन मेरे नाम करेगा… फिर हम यहां से शहर चले जाएंगे।”
महेश ने पूछा—
“और अर्जुन?”
सुनीता की आंखें अचानक खतरनाक हो गईं।
वो धीमी लेकिन डरावनी आवाज में बोली—
“जरूरत पड़ी… तो उसे रास्ते से हटाना भी पड़ेगा…”
ये सुनते ही अर्जुन का खून जम गया।
उसकी सांस रुकने लगी।
उसे विश्वास नहीं हो रहा था कि कोई औरत इतनी खतरनाक भी हो सकती है।
लेकिन तभी अचानक उसके पैर के नीचे सूखी लकड़ी टूट गई।
“कड़क!”
आवाज सुनते ही सुनीता और महेश चौकन्ने हो गए।
“कौन है वहां?”
अर्जुन का दिल जोर से धड़कने लगा।
वो जल्दी से भागने लगा।
पीछे से महेश जोर से चिल्लाया—
“अरे पकड़ो उसे!”
अंधेरी रात में अर्जुन जान बचाकर खेतों की तरफ भाग रहा था…
और पीछे महेश उसके पीछे दौड़ रहा था अंधेरी रात…
चारों तरफ खेतों में फैला सन्नाटा…
और उस सन्नाटे को चीरती अर्जुन की तेज भागती हुई सांसें।
उसका दिल इतनी तेजी से धड़क रहा था कि उसे लग रहा था जैसे सीना फट जाएगा।
पीछे से महेश की आवाज लगातार करीब आती जा रही थी—
“भाग कहां रहा है… रुक!”
अर्जुन बिना पीछे देखे दौड़ता रहा।
उसके पैरों में चप्पल भी नहीं थी।
कांटेदार खेतों में भागते हुए उसके पैरों से खून निकलने लगा था।
लेकिन उस समय उसे दर्द महसूस ही नहीं हो रहा था।
उसके दिमाग में सिर्फ एक बात थी—
“अगर आज पकड़ा गया… तो शायद जिंदा नहीं बचूंगा…”
तेज हवा चल रही थी।
आसमान में बादल गरज रहे थे।
अचानक हल्की बारिश शुरू हो गई।
अंधेरे और बारिश की वजह से रास्ता साफ दिखाई नहीं दे रहा था।
अर्जुन भागते-भागते अचानक फिसल गया और मिट्टी में गिर पड़ा।
उसके मुंह से दर्द भरी आवाज निकली।
पीछे से महेश की आवाज और करीब आ गई।
“अब भाग कहां जाएगा?”
अर्जुन घबराकर उठा और पास के गन्ने के खेत में घुस गया।
गन्ने इतने घने थे कि अंदर कुछ भी साफ दिखाई नहीं दे रहा था।
वो सांस रोककर नीचे बैठ गया।
कुछ ही सेकंड बाद महेश भी खेत के पास पहुंच गया।
उसके हाथ में टॉर्च थी।
वो गालियां देता हुआ इधर-उधर रोशनी मार रहा था।
“बाहर निकल! वरना अच्छा नहीं होगा!”
अर्जुन का पूरा शरीर कांप रहा था।
बारिश अब तेज हो चुकी थी।
महेश कुछ देर तक उसे ढूंढता रहा, फिर गुस्से में बोला—
“बच गया आज… लेकिन ज्यादा दिन नहीं बचेगा।”
इतना कहकर वो वहां से चला गया।
अर्जुन ने राहत की सांस ली।
लेकिन उसकी हालत खराब हो चुकी थी।
उसने पहली बार महसूस किया कि मामला सिर्फ जमीन का नहीं… अब उसकी जान का भी था।
करीब आधे घंटे बाद वो चुपके से घर पहुंचा।
पूरा घर सो चुका था।
लेकिन जैसे ही वो अंदर घुसा, उसने देखा कि सुनीता दरवाजे के पास खड़ी थी।
उसकी आंखें अंधेरे में भी खतरनाक लग रही थीं।
“इतनी रात कहां से आ रहे हो?”
अर्जुन कुछ पल के लिए डर गया।
लेकिन फिर खुद को संभालते हुए बोला—
“आपको क्या?”
सुनीता धीरे-धीरे उसके करीब आई।
“ज्यादा समझदार बनने की कोशिश मत करो अर्जुन… वरना नुकसान तुम्हारा ही होगा।”
उसकी आवाज में साफ धमकी थी।
अर्जुन ने पहली बार उसकी आंखों में आंखें डालकर कहा—
“मैं सब जान चुका हूं।”
कुछ सेकंड के लिए सुनीता का चेहरा उतर गया।
लेकिन अगले ही पल वो हंस पड़ी।
“क्या जान गए?”
अर्जुन गुस्से में बोला—
“तुम और महेश मिलकर पिताजी की जमीन हड़पना चाहते हो!”
सुनीता का चेहरा अचानक सख्त हो गया।
लेकिन फिर उसने बहुत शांत आवाज में कहा—
“जाकर अपने पिता को बता दो। देखते हैं वो किसकी बात मानते हैं।”
अर्जुन चुप हो गया।
क्योंकि वो जानता था…
उसके पिता अब उसकी बात पर भरोसा नहीं करेंगे।
अगली सुबह गांव में खबर फैल गई कि रघुवीर अपनी आधी जमीन बेचने वाले हैं।
ये सुनते ही अर्जुन के होश उड़ गए।
वो तुरंत घर पहुंचा।
अंदर रघुवीर कुछ कागजों पर अंगूठा लगाने वाले थे।
सुनीता उनके पास बैठी थी।
अर्जुन जोर से चिल्लाया—
“पिताजी ये मत कीजिए!”
रघुवीर गुस्से में खड़े हो गए।
“अब क्या हुआ?”
अर्जुन ने कांपती आवाज में कहा—
“ये औरत आपको बर्बाद कर देगी!”
सुनीता तुरंत रोने लगी।
“देखिए जी… मैं तो इस घर के लिए सब कर रही हूं… लेकिन आपका बेटा मुझे बदनाम कर रहा है…”
रघुवीर का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया।
उन्होंने गुस्से में अर्जुन का कॉलर पकड़ लिया।
“बस! आज के बाद अगर तूने सुनीता के खिलाफ एक शब्द भी बोला… तो इस घर से निकल जाना!”
अर्जुन की आंखें भर आईं।
उसने पहली बार अपने पिता को इतनी नफरत से उसे देखते हुए देखा था।
उस दिन अर्जुन बिना खाना खाए घर से निकल गया।
वो सीधे नदी किनारे जाकर बैठ गया।
तेज हवा चल रही थी।
नदी का पानी उफान मार रहा था।
उसकी आंखों से आंसू बहने लगे।
उसे लग रहा था कि वो पूरी तरह अकेला पड़ चुका है।
तभी पीछे से किसी ने उसके कंधे पर हाथ रखा।
अर्जुन ने मुड़कर देखा।
वो उसकी बचपन की दोस्त गौरी थी।
गौरी गांव की सीधी-सादी लड़की थी।
बचपन से दोनों साथ बड़े हुए थे।
गौरी ने चिंता से पूछा—
“क्या हुआ अर्जुन?”
अर्जुन खुद को रोक नहीं पाया।
उसने गौरी को सारी बातें बता दीं।
सब सुनने के बाद गौरी भी डर गई।
“अगर ये सच है… तो तुम्हारे पिताजी बहुत बड़े खतरे में हैं।”
अर्जुन ने सिर झुका लिया।
“लेकिन वो मेरी बात सुनते ही नहीं…”
गौरी कुछ देर सोचती रही।
फिर बोली—
“हमें सबूत चाहिए। ऐसा सबूत जिसे देखकर गांव वाले भी सच मान जाएं।”
अर्जुन ने उसकी तरफ देखा।
उसकी आंखों में पहली बार उम्मीद की हल्की चमक दिखाई दी।
उस रात अर्जुन और गौरी ने मिलकर योजना बनाई।
गांव में अगले हफ्ते बड़ा मेला लगने वाला था।
गौरी को पता था कि मेले की रात गांव के ज्यादातर लोग बाहर रहेंगे।
और उसी समय सुनीता अक्सर महेश से मिलने जाती है।
योजना के अनुसार अर्जुन और गौरी उस रात उनका पीछा करने वाले थे।
धीरे-धीरे मेला वाला दिन आ गया।
पूरा गांव रंग-बिरंगी रोशनी से जगमगा रहा था।
झूले, मिठाइयों की दुकानें, ढोल-नगाड़े, बच्चों की आवाजें…
लेकिन अर्जुन के दिल में डर था।
रात करीब 11 बजे सुनीता चुपके से घर से निकली।
उसने काले रंग की शॉल ओढ़ रखी थी।
अर्जुन और गौरी दूर-दूर उसका पीछा करने लगे।
सुनीता गांव के बाहर पुराने आम के बाग में पहुंची।
वहां महेश पहले से मौजूद था।
दोनों एक पेड़ के नीचे खड़े होकर बात करने लगे।
अर्जुन और गौरी झाड़ियों के पीछे छिप गए।
गौरी ने धीरे से अपने छोटे मोबाइल का रिकॉर्डिंग बटन ऑन कर दिया।
महेश गुस्से में बोला—
“कब तक इंतजार करेंगे? मुझे पैसे चाहिए!”
सुनीता बोली—
“बस कुछ दिन और। रघुवीर पूरी जमीन बेचने वाला है। जैसे ही पैसे मेरे हाथ में आएंगे… हम यहां से भाग जाएंगे।”
महेश हंस पड़ा।
“और वो लड़का?”
सुनीता की आवाज अचानक बेहद डरावनी हो गई—
“अगर अर्जुन बीच में आया… तो उसे हमेशा के लिए चुप कर देंगे…”
ये सुनते ही गौरी डर गई।
लेकिन तभी अचानक उसके हाथ से मोबाइल नीचे गिर गया।
“ठक!”
आवाज सुनते ही सुनीता और महेश चौकन्ने हो गए।
“कौन है वहां?”
अर्जुन और गौरी के चेहरे का रंग उड़ गया।
महेश तेजी से उनकी तरफ दौड़ने लगा रात का अंधेरा और भी गहरा हो चुका था।
आम के पेड़ों के बीच तेज हवा सनसनाती हुई गुजर रही थी।
गौरी के हाथ से मोबाइल गिरने की आवाज पूरे बाग में गूंज गई थी।
“कौन है वहां?”
महेश गुस्से में चिल्लाया और तेजी से झाड़ियों की तरफ भागा।
अर्जुन का दिल जोर-जोर से धड़कने लगा।
उसने तुरंत गौरी का हाथ पकड़ा और फुसफुसाया—
“भागो!”
दोनों अंधेरे में जान बचाकर दौड़ पड़े।
पीछे से महेश गालियां देता हुआ उनके पीछे भाग रहा था।
सुनीता भी घबराकर चिल्ला रही थी—
“उन्हें पकड़ो! अगर गांव में बात फैल गई तो सब खत्म हो जाएगा!”
अर्जुन और गौरी की सांसें टूटने लगी थीं।
पेड़ों की टहनियां उनके चेहरे पर लग रही थीं, पैरों में कांटे चुभ रहे थे, लेकिन दोनों रुके नहीं।
आम के बाग से निकलते ही सामने कीचड़ भरा रास्ता था।
अचानक गौरी का पैर फिसला और वो नीचे गिर गई।
उसके मुंह से दर्द भरी चीख निकली।
अर्जुन तुरंत रुका।
“गौरी!”
गौरी का पैर बुरी तरह मुड़ गया था।
पीछे से महेश की आवाज करीब आती जा रही थी।
अर्जुन घबरा गया।
उसने बिना कुछ सोचे गौरी को उठाया और कंधे का सहारा देकर दौड़ने लगा।
बारिश भी शुरू हो चुकी थी।
पूरा रास्ता कीचड़ से भर गया था।
महेश अब बिल्कुल करीब पहुंच चुका था।
तभी अचानक सामने मेले की तेज रोशनी दिखाई दी।
लोगों की भीड़ और ढोल की आवाज सुनाई देने लगी।
अर्जुन ने राहत की सांस ली।
वो जल्दी से गौरी को लेकर भीड़ में घुस गया।
महेश भी वहां तक आया… लेकिन भीड़ देखकर रुक गया।
उसने गुस्से में दांत पीसे।
“आज बच गए… लेकिन ज्यादा दिन नहीं।”
इतना कहकर वो वापस अंधेरे में चला गया।
अर्जुन और गौरी भीड़ के बीच एक दुकान के पीछे जाकर बैठ गए।
दोनों बुरी तरह कांप रहे थे।
गौरी की आंखों में डर साफ दिखाई दे रहा था।
“अर्जुन… वो लोग सच में हमें मार सकते हैं…”
अर्जुन ने कांपते हाथों से मोबाइल उठाया।
स्क्रीन टूटी हुई थी… लेकिन रिकॉर्डिंग चल रही थी।
उसकी आंखों में उम्मीद चमक उठी।
“गौरी… सबूत मिल गया!”
दोनों ने जल्दी से रिकॉर्डिंग सुनी।
सुनीता की आवाज साफ रिकॉर्ड हुई थी—
“अगर अर्जुन बीच में आया… तो उसे हमेशा के लिए चुप कर देंगे…”
गौरी की आंखों में खुशी और डर दोनों थे।
“अब तुम्हारे पिताजी को सच बताना होगा!”
लेकिन अर्जुन चुप हो गया।
उसे पता था…
अगर उसने जल्दबाजी की, तो सुनीता कुछ भी कर सकती है।
अगली सुबह गांव में मेला खत्म हो चुका था।
लोग अपने-अपने घर लौट रहे थे।
अर्जुन रातभर सो नहीं पाया।
वो बार-बार रिकॉर्डिंग सुनता रहा।
अब उसके पास सच था।
लेकिन उसे सही समय का इंतजार करना था।
उधर घर में सुनीता का व्यवहार अचानक बदल गया था।
वो अर्जुन को अजीब नजरों से देखने लगी थी।
जैसे उसे शक हो गया हो कि अर्जुन सब जान चुका है।
दोपहर में अर्जुन घर पहुंचा तो उसने देखा कि रघुवीर बहुत खुश बैठे हैं।
सुनीता उनके पास चाय लेकर बैठी थी।
रघुवीर मुस्कुराकर बोले—
“अर्जुन, एक खुशखबरी है!”
अर्जुन चुप रहा।
“मैंने फैसला किया है कि अगले हफ्ते सारी जमीन बेचकर शहर में नया घर खरीदेंगे।”
ये सुनते ही अर्जुन के पैरों तले जमीन खिसक गई।
“क्या?”
सुनीता तुरंत बोली—
“गांव में रखा ही क्या है? शहर में नई जिंदगी शुरू करेंगे।”
अर्जुन समझ गया…
यही उनका असली प्लान था।
जमीन बिकते ही वो सारे पैसे लेकर भागने वाले थे।
उसने गुस्से में कहा—
“पिताजी, ये बहुत बड़ी गलती है!”
रघुवीर का चेहरा उतर गया।
“फिर शुरू हो गया तू?”
अर्जुन ने पहली बार जोर से कहा—
“क्योंकि ये औरत आपसे प्यार नहीं करती!”
इतना सुनते ही सुनीता रोने का नाटक करने लगी।
“हे भगवान… मैंने इस घर के लिए क्या-क्या नहीं किया… और बदले में ये सब सुनना पड़ रहा है…”
रघुवीर का गुस्सा फूट पड़ा।
उन्होंने अर्जुन को जोर से धक्का दिया।
“निकल जा यहां से! आज के बाद इस घर में कदम मत रखना!”
अर्जुन दीवार से टकराकर गिर पड़ा।
उसकी आंखों में आंसू आ गए।
लेकिन इस बार दर्द थप्पड़ का नहीं था…
दर्द इस बात का था कि उसका अपना पिता अब पूरी तरह अंधा हो चुका था।
अर्जुन चुपचाप घर से बाहर निकल गया।
गांव की गलियों में चलते हुए उसकी आंखें भर आईं।
उसे लग रहा था जैसे उसका अपना घर उससे छिन गया हो।
शाम होते-होते वो भोलाराम काका के घर पहुंचा।
काका ने उसकी हालत देखी तो सब समझ गए।
“क्या हुआ बेटा?”
अर्जुन ने सारी बात बता दी।
भोलाराम काका गहरी सोच में पड़ गए।
फिर धीरे से बोले—
“अब सच सामने लाने का सिर्फ एक ही तरीका है…”
“क्या?”
“पूरे गांव के सामने सुनीता का असली चेहरा दिखाना होगा।”
अर्जुन ध्यान से सुनने लगा।
काका बोले—
“अगले दो दिन बाद पंचायत बैठेगी। गांव के सारे बड़े लोग आएंगे। अगर वहां सबूत चला दिया… तो रघुवीर भी सच मानने को मजबूर हो जाएगा।”
अर्जुन की आंखों में उम्मीद लौट आई।
उधर दूसरी तरफ…
उस रात सुनीता और महेश फिर मिले।
इस बार दोनों के चेहरे पर डर साफ दिखाई दे रहा था।
महेश गुस्से में बोला—
“मुझे लगता है वो लड़का सब जान चुका है!”
सुनीता की आंखों में खतरनाक चमक आ गई।
“तो पंचायत से पहले उसे रास्ते से हटाना पड़ेगा…”
महेश कुछ सेकंड चुप रहा।
फिर धीरे से बोला—
“क्या करने का सोच रही हो?”
सुनीता ने ठंडी आवाज में कहा—
“कल रात वो अक्सर नदी वाले रास्ते से जाता है ना… वहीं उसका काम खत्म कर देंगे।”
महेश हंस पड़ा।
“फिर ना रहेगा लड़का… ना कोई सबूत…”
दोनों की खतरनाक हंसी अंधेरे में गूंजने लगी।
लेकिन उन्हें नहीं पता था…
टूटी हुई दीवार के पीछे खड़ा एक इंसान उनकी सारी बातें सुन चुका था।
वो इंसान था — रघुवीर।
उसके हाथ कांप रहे थे…
आंखों में अविश्वास था…
और दिल पूरी तरह टूट चुका था रात का गहरा अंधेरा…
पुराने खंडहर की टूटी दीवारें…
और उन दीवारों के पीछे खड़ा रघुवीर।
उसकी सांसें तेज चल रही थीं।
चेहरा पसीने से भीग चुका था।
उसे अपने कानों पर विश्वास नहीं हो रहा था।
जिस औरत पर उसने आंख बंद करके भरोसा किया…
जिसके लिए उसने अपने बेटे तक को ठुकरा दिया…
वही औरत उसके बेटे को मारने की योजना बना रही थी।
सुनीता और महेश की बातें अब भी उसके कानों में गूंज रही थीं—
“नदी वाले रास्ते में काम खत्म कर देंगे…”
रघुवीर का दिल अंदर से टूट गया।
उसकी आंखों के सामने अर्जुन का बचपन घूमने लगा।
वो छोटा सा बच्चा…
जो मां के मरने के बाद भी कभी शिकायत नहीं करता था।
जो खेतों में उसके साथ काम करता था।
जो हर मुश्किल में उसके साथ खड़ा रहा।
और उसने उसी बेटे को घर से निकाल दिया।
रघुवीर की आंखों से आंसू बह निकले।
उधर सुनीता और महेश वहां से जा चुके थे।
रघुवीर कुछ देर वहीं बैठा रहा।
उसकी आत्मा जैसे उसे धिक्कार रही थी।
“मैं कैसा बाप निकला…”
अगली सुबह गांव में पंचायत बैठने वाली थी।
गांव के चौपाल में बड़े-बड़े लोग इकट्ठा हो रहे थे।
सरपंच, गांव वाले, बूढ़े किसान, औरतें…
सबको खबर लग चुकी थी कि रघुवीर के घर में बड़ा झगड़ा चल रहा है।
उधर अर्जुन पूरी रात सो नहीं पाया था।
उसके पास रिकॉर्डिंग थी।
लेकिन उसके दिल में डर भी था।
अगर सुनीता कुछ कर बैठी तो?
सुबह-सुबह गौरी उसके पास आई।
“डर मत अर्जुन। आज सच जरूर जीतेगा।”
अर्जुन ने हल्का सा सिर हिलाया।
लेकिन तभी अचानक भोलाराम काका दौड़ते हुए वहां पहुंचे।
उनकी सांसें फूली हुई थीं।
“अर्जुन! जल्दी भाग यहां से!”
अर्जुन घबरा गया।
“क्या हुआ?”
काका बोले—
“महेश और उसके आदमी तुम्हें ढूंढ रहे हैं!”
इतना सुनते ही अर्जुन समझ गया कि मामला बहुत खतरनाक हो चुका है।
लेकिन उसने भागने से मना कर दिया।
“नहीं काका… आज अगर मैं डर गया… तो पिताजी हमेशा के लिए बर्बाद हो जाएंगे।”
उसकी आंखों में पहली बार डर से ज्यादा हिम्मत थी।
कुछ देर बाद पंचायत शुरू हुई।
पूरा गांव चौपाल के पास जमा था।
रघुवीर भी वहां बैठे थे।
लेकिन आज उनका चेहरा बदला हुआ था।
आंखों में गहरी शर्म थी।
सुनीता भी वहां आई।
उसके चेहरे पर बनावटी मासूमियत थी।
वो गांव वालों से बोली—
“मैंने तो हमेशा इस घर को संभालने की कोशिश की… लेकिन अर्जुन मुझे बदनाम कर रहा है…”
कुछ गांव वाले उसकी बातों में आ भी गए।
तभी अचानक अर्जुन आगे बढ़ा।
उसकी आंखों में गुस्सा और दर्द दोनों थे।
“आज सच सबके सामने आएगा।”
सुनीता का चेहरा हल्का उतर गया।
अर्जुन ने मोबाइल निकाला।
“ये सुनिए…”
पूरा चौपाल शांत हो गया।
फिर रिकॉर्डिंग चलने लगी।
पहले महेश की आवाज आई—
“और वो लड़का?”
फिर सुनीता की ठंडी, डरावनी आवाज गूंजी—
“अगर अर्जुन बीच में आया… तो उसे हमेशा के लिए चुप कर देंगे…”
पूरा चौपाल सन्न रह गया।
औरतों के मुंह खुल गए।
गांव वाले एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे।
सुनीता का रंग उड़ गया।
“ये झूठ है!” वो चीखी।
लेकिन रिकॉर्डिंग आगे चलती रही—
“जमीन बिकते ही हम शहर भाग जाएंगे…”
अब सब साफ हो चुका था।
गांव में गुस्से की लहर दौड़ गई।
“धोखेबाज औरत!”
“इसने रघुवीर को बर्बाद कर दिया!”
सुनीता घबराकर पीछे हटने लगी।
तभी महेश वहां पहुंच गया।
उसने देखा कि पूरा सच सामने आ चुका है।
वो जल्दी से सुनीता का हाथ पकड़कर भागने लगा।
लेकिन गांव वाले पहले ही गुस्से में थे।
कुछ लोग उनके पीछे दौड़ पड़े।
महेश भागते-भागते अर्जुन को धक्का देकर निकलने लगा।
अर्जुन नीचे गिर पड़ा।
तभी महेश ने जेब से चाकू निकाल लिया।
पूरा चौपाल डर गया।
“कोई पास मत आना!”
सुनीता कांप रही थी।
महेश गुस्से में बोला—
“सब बर्बाद कर दिया इस लड़के ने!”
वो अर्जुन की तरफ बढ़ा।
लेकिन तभी अचानक रघुवीर बीच में आ गए।
“नहीं!”
महेश ने गुस्से में चाकू चलाया।
चाकू रघुवीर के कंधे में लग गया।
पूरा गांव चीख उठा।
अर्जुन की आंखें फट गईं।
“पिताजी!”
गुस्से में गांव वालों ने महेश को पकड़ लिया।
सुनीता भागने लगी… लेकिन औरतों ने उसे घेर लिया।
कुछ ही देर में दोनों को बांध दिया गया।
उधर अर्जुन रोते हुए अपने पिता को संभाल रहा था।
रघुवीर की आंखों से आंसू बह रहे थे।
उन्होंने कांपते हाथों से अर्जुन का चेहरा पकड़ा।
“मुझे माफ कर दे बेटा…”
अर्जुन फूट-फूटकर रो पड़ा।
“ऐसा मत कहिए पिताजी…”
रघुवीर की आवाज टूट गई।
“मैं अंधा हो गया था… मैंने अपने ही बेटे पर भरोसा नहीं किया…”
अर्जुन ने अपने पिता को गले लगा लिया।
पूरा गांव उस दृश्य को देखकर भावुक हो गया।
कुछ देर बाद पुलिस आई और महेश व सुनीता को गिरफ्तार करके ले गई।
जाते-जाते भी सुनीता की आंखों में पछतावा नहीं था…
बस हार का गुस्सा था।
उस घटना के बाद रघुवीर पूरी तरह बदल गए।
उन्होंने शराब छोड़ दी।
जमीन बेचने का फैसला रद्द कर दिया।
अब वो हर फैसले में अर्जुन की राय लेने लगे।
धीरे-धीरे घर में फिर से खुशियां लौटने लगीं।
गौरी भी अक्सर घर आने लगी।
गांव वालों को अब समझ आ गया था कि अर्जुन गलत नहीं था।
एक शाम सूर्यास्त के समय अर्जुन खेत में खड़ा था।
ठंडी हवा चल रही थी।
सामने उसके पिता मुस्कुराते हुए काम कर रहे थे।
कई सालों बाद उसके घर में फिर से सुकून लौट आया था।
तभी पीछे से गौरी की आवाज आई—
“अब सब ठीक हो गया ना?”
अर्जुन हल्का सा मुस्कुराया।
“हां… अब मां भी जहां होंगी… खुश होंगी…”
आसमान में ढलता हुआ सूरज धीरे-धीरे खेतों पर सुनहरी रोशनी फैला रहा था…
और अर्जुन की जिंदगी में आखिरकार अंधेरे के बाद नई सुबह आ चुकी थी


Comments
Post a Comment