गरीब दर्जी की अमीर दुल्हन

 उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गाँव “रामपुरा” में अर्जुन नाम का एक गरीब लड़का रहता था।

उसकी छोटी-सी कपड़ों की दुकान थी, जहाँ वह दिन-रात लोगों के फटे कपड़े सिलकर अपना गुज़ारा करता था। दुकान भी ऐसी कि बरसात में छत टपकती रहती, गर्मियों में अंदर बैठना मुश्किल हो जाता।


अर्जुन का दिल बहुत साफ था।

गाँव में कोई गरीब आदमी कपड़े सिलवाने आता, तो वह आधे पैसे ही लेता। कई बार तो बिना पैसे के भी कपड़े दे देता।











लेकिन उसकी गरीबी का लोग मज़ाक उड़ाते थे।


“अरे अर्जुन, तेरी शादी कौन करेगा?”

“खुद के पास पहनने को ढंग का कुर्ता नहीं, बीवी कहाँ से लाएगा?”


गाँव वाले हँसते रहते, और अर्जुन बस मुस्कुरा देता।


उसी गाँव में राधिका नाम की एक बहुत सुंदर लड़की रहती थी।

गोरा चेहरा, बड़ी-बड़ी आँखें और शांत स्वभाव। उसका परिवार गाँव के सबसे अमीर लोगों में गिना जाता था। उसके पिता ठाकुर महेंद्र सिंह की पूरे इलाके में इज़्ज़त थी।


राधिका की शादी शहर के एक बड़े व्यापारी के बेटे से तय हुई थी। पूरे गाँव में उसी शादी की चर्चा थी।


लेकिन शादी वाले दिन अचानक सब कुछ बदल गया।


बारात दरवाजे तक पहुँची ही थी कि लड़के वालों ने दहेज में एक नई कार और पाँच लाख रुपये माँग लिए।


ठाकुर महेंद्र सिंह के चेहरे का रंग उड़ गया।


“हमने पहले ही बहुत कुछ दिया है…” उन्होंने हाथ जोड़कर कहा।


लेकिन लड़के का पिता घमंड से बोला,

“अगर शादी करनी है तो हमारी शर्त मानो… वरना बारात वापस जाएगी।”


पूरा माहौल सन्नाटे में बदल गया।

राधिका की आँखों से आँसू बहने लगे। गाँव वाले तमाशा देख रहे थे, लेकिन कोई आगे नहीं आया।


तभी भीड़ के पीछे खड़ा अर्जुन सब देख रहा था।


उससे राधिका के आँसू देखे नहीं गए।


अचानक वह आगे आया और बोला—


“ठाकुर साहब… अगर आपको मंज़ूर हो… तो मैं राधिका जी से शादी करने के लिए तैयार हूँ।”


पूरा गाँव दंग रह गया।


“एक गरीब दर्जी ठाकुर की बेटी से शादी करेगा?”

“इसकी हिम्मत कैसे हुई?”


लोग फुसफुसाने लगे।


ठाकुर महेंद्र सिंह गुस्से से अर्जुन की तरफ देखने लगे, लेकिन तभी उनकी नज़र रोती हुई राधिका पर पड़ी।


उन्हें समझ आ गया कि अमीर लोग सिर्फ उनकी इज़्ज़त खरीदना चाहते थे… जबकि यह गरीब लड़का बिना किसी लालच के उनकी बेटी की इज़्ज़त बचाने आया था।


कुछ देर की खामोशी के बाद ठाकुर साहब ने भारी आवाज़ में कहा—


“अगर मेरी बेटी राज़ी है… तो मुझे यह रिश्ता मंज़ूर है।”


सभी की नज़र राधिका पर टिक गई।


राधिका ने धीरे से आँसू पोंछे…

और पहली बार अर्जुन की तरफ देखकर सिर हिला दिया।


उसी मंडप में, उसी रात…

एक गरीब दर्जी और अमीर घर की लड़की की शादी हो गई।


लेकिन किसी को नहीं पता था…

कि यह शादी आगे चलकर दोनों की ज़िंदगी पूरी तरह बदलने वाली थी शादी के अगले दिन जब राधिका पहली बार अर्जुन के घर पहुँची, तो उसकी आँखें सब देखकर ठहर गईं।










कच्ची दीवारें…

टूटी हुई चारपाई…

छत के कोनों में जाले…

और एक छोटा-सा चूल्हा, जहाँ अर्जुन की बूढ़ी माँ खाना बना रही थीं।


यह सब उस लड़की के लिए बिल्कुल नया था, जिसने हमेशा हवेली जैसी जिंदगी देखी थी।


गाँव की औरतें घर के बाहर खड़ी फुसफुसा रही थीं—


“देखो ठाकुर की बेटी कहाँ आ गई…”

“दो दिन में भाग जाएगी यहाँ से…”


राधिका सब सुन रही थी, लेकिन चुप थी।


अर्जुन थोड़ा झिझकते हुए बोला,

“घर छोटा है… लेकिन कोशिश करूँगा तुम्हें कभी तकलीफ़ ना हो।”


उसकी आवाज़ में शर्म भी थी और डर भी।


राधिका ने पहली बार घर के अंदर चारों तरफ देखा…

फिर धीमे से बोली—


“घर बड़ा नहीं होता अर्जुन जी… इंसान का दिल बड़ा होना चाहिए।”


अर्जुन बस उसे देखता रह गया।


उसे यकीन ही नहीं हो रहा था कि इतने अमीर घर की लड़की बिना शिकायत किए इस टूटे घर में खड़ी है।


रात को अर्जुन दुकान पर बैठा कपड़े सिल रहा था।

पुरानी मशीन की “ठक-ठक” पूरे कमरे में गूँज रही थी।


तभी राधिका उसके पास आई और बोली—


“आप रोज़ इतनी देर तक काम करते हैं?”


अर्जुन हल्का मुस्कुराया,

“अगर मशीन रुक गई… तो चूल्हा भी रुक जाएगा।”


उसकी बात सुनकर राधिका की आँखें भर आईं।


उसने पहली बार महसूस किया कि गरीबी सिर्फ पैसों की कमी नहीं होती…

बल्कि हर दिन की लड़ाई होती है।


अगली सुबह राधिका जल्दी उठी।

उसने पूरे घर की सफाई की, चूल्हे पर खाना बनाया और अर्जुन की माँ के पैर दबाने लगी।


बूढ़ी माँ हैरानी से बोलीं—


“बेटी… तुम ठाकुर घर की लड़की होकर ये सब काम कर रही हो?”


राधिका मुस्कुराई—


“अब मैं इस घर की बहू हूँ अम्मा।”


धीरे-धीरे घर में खुशियाँ आने लगीं।


लेकिन गाँव वालों को यह खुशी पसंद नहीं आ रही थी।


एक दिन अर्जुन दुकान पर काम कर रहा था, तभी कुछ अमीर लड़के वहाँ आए और हँसने लगे—


“अरे दर्जी… ठाकुर की बेटी को कितने में खरीदा?”

“लगता है दहेज में पुरानी सिलाई मशीन मिली होगी!”










सभी जोर-जोर से हँसने लगे।


अर्जुन चुपचाप सिर झुकाकर काम करता रहा।


तभी पीछे से राधिका की आवाज़ आई—


“गरीब वो नहीं होता जिसके पास पैसे कम हों… गरीब वो होता है जिसकी सोच छोटी हो।”


पूरा माहौल शांत हो गया।


राधिका पहली बार अर्जुन के लिए किसी के सामने खड़ी हुई थी।


अर्जुन की आँखों में आँसू आ गए।


उस दिन उसे पहली बार लगा…

कि शायद भगवान ने उसकी जिंदगी में राधिका को किसी वजह से भेजा है।


लेकिन उसी रात…

राधिका के पिता ठाकुर महेंद्र सिंह अचानक अर्जुन के घर आ पहुँचे।


उनके चेहरे पर गुस्सा साफ दिखाई दे रहा था रात का समय था।

बाहर तेज़ हवा चल रही थी। अर्जुन अपनी दुकान बंद करने ही वाला था कि अचानक घर के बाहर कई गाड़ियों की आवाज़ गूँजने लगी।


पूरा गाँव चौकन्ना हो गया।


“लगता है ठाकुर साहब आए हैं…”

लोग धीरे-धीरे अर्जुन के घर के बाहर इकट्ठा होने लगे।


अर्जुन बाहर निकला तो देखा—

सामने ठाकुर महेंद्र सिंह खड़े थे। सफेद कुर्ता, बड़ी मूँछें और आँखों में गुस्सा।


उनके पीछे चार आदमी भी खड़े थे।


राधिका अपने पिता को देखकर खुश हुई और जल्दी से उनके पास गई—


“पिताजी…”


लेकिन ठाकुर साहब ने उसकी तरफ देखा तक नहीं।


उन्होंने गुस्से में अर्जुन की तरफ उंगली करते हुए कहा—


“मेरी बेटी को इस गरीबी में रखने की हिम्मत कैसे हुई तुम्हारी?”


पूरा माहौल शांत हो गया।


अर्जुन धीरे से बोला,

“मैं राधिका जी को खुश रखने की पूरी कोशिश कर रहा हूँ…”


“कोशिश?” ठाकुर साहब चीखे।

“मेरी बेटी नौकरों के बीच पली है… और यहाँ मिट्टी के घर में रह रही है!”


राधिका बीच में बोली—


“पिताजी, मैं यहाँ खुश हूँ…”


लेकिन ठाकुर साहब ने उसकी बात काट दी—


“चुप! तुम्हें समझ नहीं आ रहा तुमने कितनी बड़ी गलती कर दी है।”


अर्जुन की बूढ़ी माँ डर के मारे एक कोने में खड़ी थीं।


गाँव वाले तमाशा देख रहे थे।


तभी ठाकुर साहब ने जेब से पैसों से भरा बैग निकाला और अर्जुन के सामने फेंक दिया।


“इसमें पाँच लाख रुपये हैं।

मेरी बेटी को छोड़ दो… और अपनी औकात में रहो।”


अर्जुन की आँखें भर आईं।


उसने बैग की तरफ देखा… फिर राधिका की तरफ।


उसके दिल में तूफान चल रहा था।


एक तरफ गरीबी थी…

बीमार माँ थी…

टूटा घर था…


और दूसरी तरफ राधिका।


कुछ पल की खामोशी के बाद अर्जुन ने धीरे से बैग उठाया।


राधिका की साँसें रुक गईं।


“अर्जुन जी… आप ये क्या कर रहे हैं?” उसकी आवाज काँप रही थी।


अर्जुन ने नीचे नज़र झुका ली।


उसकी आँखों से आँसू टपक पड़े।


“मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूँ राधिका जी…”

“लेकिन मैं तुम्हें वो जिंदगी नहीं दे सकता जिसकी तुम हकदार हो।”


यह सुनते ही राधिका का दिल टूट गया।


उसने रोते हुए कहा—


“मुझे अमीरी नहीं चाहिए… मुझे सिर्फ आपका साथ चाहिए!”


लेकिन अर्जुन ने उसकी तरफ देखा भी नहीं।


ठाकुर साहब मुस्कुराए।

उन्हें लगा गरीब लड़का आखिर पैसों के आगे झुक ही गया।


उन्होंने राधिका का हाथ पकड़ा और गाड़ी की तरफ ले जाने लगे।


राधिका लगातार रो रही थी।


“अर्जुन जी… मुझे मत जाने दीजिए…”


लेकिन अर्जुन पत्थर की तरह खड़ा रहा।


कुछ ही देर में गाड़ियाँ वहाँ से चली गईं।


पूरा घर खाली हो गया।


अर्जुन धीरे-धीरे जमीन पर बैठ गया…

और फूट-फूट कर रोने लगा।


तभी उसकी माँ उसके पास आईं और बोलीं—


“बेटा… तूने बहुत बड़ी गलती कर दी।”


अर्जुन ने काँपती आवाज़ में कहा—


“अम्मा… मैंने उसे खुशी देने के लिए छोड़ा है…”


लेकिन उसकी माँ ने जो अगली बात कही…

उसे सुनकर अर्जुन के पैरों तले जमीन खिसक गई।


“राधिका… माँ बनने वाली है अम्मा की बात सुनते ही अर्जुन की साँसें रुक गईं।


“क्या…?”

उसके हाथ काँपने लगे।


अम्मा की आँखों में आँसू थे।


“हाँ बेटा… आज सुबह राधिका ने मुझे बताया था। वो चाहती थी पहले तुझे खुद बताए…”


अर्जुन वहीं जमीन पर बैठ गया।

उसके कानों में सिर्फ एक ही बात गूँज रही थी—


“राधिका माँ बनने वाली है…”


उसकी आँखों के सामने राधिका का रोता हुआ चेहरा घूमने लगा।


“अर्जुन जी… मुझे मत जाने दीजिए…”


लेकिन उसने उसे रोकने की कोशिश तक नहीं की।


अर्जुन ने दोनों हाथों से अपना सिर पकड़ लिया।


“मैंने ये क्या कर दिया अम्मा…”


उस रात अर्जुन पूरी रात नहीं सोया।


बार-बार उसे अपनी गलती का एहसास हो रहा था।

जिस लड़की ने अमीरी छोड़कर उसका साथ चुना… उसी को उसने पैसों के लिए खुद से दूर कर दिया।


सुबह होते ही अर्जुन बिना कुछ खाए ठाकुर साहब की हवेली की तरफ भागा।


तेज धूप थी…

पैरों में चप्पल तक नहीं थी…

लेकिन वह लगातार दौड़ता रहा।


जब वह हवेली पहुँचा, तो दरवाजे पर खड़े नौकर ने उसे रोक लिया।


“कहाँ घुस रहा है?”


अर्जुन हाँफते हुए बोला—

“मुझे राधिका जी से मिलना है… बस एक बार…”


तभी अंदर से ठाकुर महेंद्र सिंह बाहर आए।


उन्होंने गुस्से से कहा—


“तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई यहाँ आने की?”


अर्जुन हाथ जोड़कर बोला—


“मुझसे गलती हो गई ठाकुर साहब… मैं राधिका जी को वापस लेने आया हूँ।”


ठाकुर साहब जोर से हँसे।


“अब याद आई मेरी बेटी?”

“जब पैसे लिए थे तब नहीं सोचा?”


अर्जुन चुप रहा।


उसकी आँखों में पछतावा साफ दिख रहा था।


तभी ऊपर बालकनी में खड़ी राधिका दिखाई दी।


उसकी आँखें सूजी हुई थीं।

लगता था पूरी रात रोती रही थी।


अर्जुन उसे देखकर टूट गया।


“राधिका जी… मुझे माफ कर दीजिए…”


राधिका की आँखों से आँसू बह निकले, लेकिन उसने कुछ नहीं कहा।


ठाकुर साहब बीच में आ गए।


“अब बहुत देर हो चुकी है।”

“अगले हफ्ते मैं राधिका की शादी शहर के बड़े बिजनेसमैन से करवा रहा हूँ।”


यह सुनते ही अर्जुन के पैरों तले जमीन खिसक गई।


“लेकिन वो मेरी पत्नी है!” अर्जुन चीखा।


ठाकुर साहब गुस्से में बोले—


“गरीब आदमी सिर्फ सपने देख सकता है… ठाकुर की बेटी का पति बनने की औकात नहीं रखता।”


इतना कहकर उन्होंने नौकरों को इशारा किया।


दो आदमी आए और अर्जुन को धक्का देकर हवेली से बाहर फेंक दिया।


अर्जुन सड़क पर गिर पड़ा।

उसके होंठ से खून निकल आया।


ऊपर बालकनी में खड़ी राधिका रो रही थी…

लेकिन चाहकर भी कुछ नहीं कर पा रही थी।


अर्जुन धीरे-धीरे उठा।


उसकी आँखों में अब आँसू नहीं थे…

बल्कि एक अजीब-सी आग जल रही थी।


उसने हवेली की तरफ देखकर धीरे से कहा—


“अब मैं गरीब दर्जी बनकर नहीं लौटूँगा…”


“जिस दिन वापस आऊँगा… उस दिन पूरी दुनिया देखेगी कि गरीब आदमी की इज़्ज़त कितनी बड़ी होती है…”


और इतना कहकर अर्जुन वहाँ से चला गया।


लेकिन उसे नहीं पता था…

कि उसी रात राधिका के साथ हवेली में कुछ ऐसा होने वाला है…

जो सबकी जिंदगी बदल देगा उस रात हवेली में अजीब-सी खामोशी थी।


चारों तरफ रोशनी थी…

बड़े-बड़े झूमर जल रहे थे…

नौकर इधर-उधर भाग रहे थे…

लेकिन फिर भी हवेली के अंदर एक डर छुपा हुआ था।


राधिका अपने कमरे में खिड़की के पास बैठी थी।

उसकी आँखें लगातार रो-रोकर लाल हो चुकी थीं।


बारिश शुरू हो चुकी थी।

खिड़की से आती ठंडी हवा उसके चेहरे को छू रही थी, लेकिन उसके अंदर जो तूफान था… उसके सामने यह बारिश कुछ भी नहीं थी।


उसने धीरे से अपना हाथ पेट पर रखा।


उसकी आँखों से आँसू बह निकले।


“आप क्यों चले गए अर्जुन जी…”

“मैंने तो सिर्फ आपका साथ माँगा था…”


उसे अर्जुन की हर बात याद आ रही थी।


वो छोटा-सा घर…

पुरानी सिलाई मशीन…

रात-रात भर काम करता अर्जुन…

और उसकी वो मुस्कान… जो गरीबी में भी कभी गायब नहीं होती थी।


तभी कमरे का दरवाज़ा खुला।


ठाकुर महेंद्र सिंह अंदर आए।


उनके चेहरे पर गुस्सा नहीं था…

लेकिन सख्ती अब भी साफ दिखाई दे रही थी।


उन्होंने राधिका की तरफ देखा और बोले—


“अगले हफ्ते तुम्हारी शादी विक्रम से होगी।”


राधिका ने धीरे से सिर उठाया।


“मैं ये शादी नहीं करूँगी पिताजी।”


ठाकुर साहब की आँखें लाल हो गईं।


“तुम्हें करना पड़ेगा!”


“लेकिन मैं अर्जुन जी की पत्नी हूँ…”


“वो लड़का तुम्हें बेच चुका है!” ठाकुर साहब चीखे।


यह सुनते ही राधिका खड़ी हो गई।


उसकी आँखों में पहली बार गुस्सा दिखाई दिया।


“नहीं!”

“उन्होंने मुझे बेचा नहीं… खुद से दूर किया है…”


“क्योंकि वो मुझसे प्यार करते हैं।”


कुछ पल के लिए कमरे में सन्नाटा छा गया।


ठाकुर साहब पहली बार अपनी बेटी की आँखों में इतनी मजबूती देख रहे थे।


लेकिन उनका घमंड अभी भी जिंदा था।


“एक गरीब दर्जी तुम्हें खुश नहीं रख सकता!”


राधिका की आवाज काँप गई—


“पैसों से बड़ा इंसान का दिल होता है पिताजी…”


“और अर्जुन जी का दिल बहुत बड़ा है…”


ठाकुर साहब गुस्से में कमरे से बाहर चले गए।


दरवाज़ा जोर से बंद हुआ।


राधिका फिर से रोने लगी।


उधर दूसरी तरफ…


अर्जुन गाँव छोड़कर शहर की तरफ जा रहा था।


तेज बारिश हो रही थी।

उसके कपड़े पूरी तरह भीग चुके थे।


जेब में सिर्फ कुछ रुपये थे।


लेकिन उसकी आँखों में एक ही सपना था—


“मुझे इतना बड़ा बनना है… कि कोई गरीब होने पर किसी की इज़्ज़त ना छीने।”


पूरी रात वह बस चलता रहा।


सुबह होते-होते वह शहर पहुँच गया।


चारों तरफ बड़ी-बड़ी इमारतें थीं।

गाड़ियों का शोर…

भीड़…

और हर चेहरे पर भागती हुई जिंदगी।


अर्जुन ने एक छोटी-सी कपड़ों की फैक्ट्री में काम माँगा।


मालिक ने उसे ऊपर से नीचे तक देखा।


“क्या आता है?”


अर्जुन बोला—

“कपड़े सिलना।”


मालिक हँसा—


“यहाँ बड़े-बड़े डिजाइनर काम करते हैं… गाँव के दर्जी नहीं।”


इतना कहकर उसने अर्जुन को बाहर निकाल दिया।


पूरा दिन अर्जुन काम ढूँढता रहा…

लेकिन हर जगह उसे गरीब समझकर भगा दिया गया।


शाम तक उसके पास खाने तक के पैसे नहीं बचे।


भूखा-प्यासा अर्जुन सड़क किनारे बैठ गया।


बारिश फिर शुरू हो चुकी थी।


उसने आसमान की तरफ देखा।


“हे भगवान… बस एक मौका दे दो…”


तभी सामने सड़क पर अचानक जोरदार आवाज हुई—


“धड़ाम!!!”


एक बड़ी कार का एक्सीडेंट हो गया था।


लोग डरकर दूर हट गए।


कार के अंदर एक बूढ़ा आदमी फँसा हुआ था।

गाड़ी से धुआँ निकल रहा था।


सभी तमाशा देख रहे थे…

लेकिन कोई मदद के लिए आगे नहीं आया।


अर्जुन तुरंत दौड़ा।


उसने बिना अपनी जान की परवाह किए कार का दरवाज़ा तोड़ने की कोशिश शुरू कर दी।


हाथ कट गए…

खून निकलने लगा…


लेकिन वह रुका नहीं।


कुछ देर बाद उसने किसी तरह बूढ़े आदमी को बाहर निकाल लिया।


उसी पल कार में आग लग गई।


पूरा इलाका दहल गया।


लोग हैरानी से अर्जुन को देखने लगे।


बूढ़ा आदमी बुरी तरह घायल था।


अर्जुन ने उसे अपने कंधे पर उठाया और अस्पताल की तरफ भागा।


अस्पताल पहुँचते ही डॉक्टर उसे अंदर ले गए।


करीब एक घंटे बाद डॉक्टर बाहर आए।


“अगर पाँच मिनट और देर हो जाती… तो मरीज बचता नहीं।”


अर्जुन ने राहत की साँस ली।


तभी एक आदमी भागता हुआ आया।


“सर! आप ठीक हैं?”


अर्जुन को पता चला…

जिस बूढ़े आदमी की उसने जान बचाई थी…

वो शहर के सबसे बड़े कपड़ा व्यापारी “सेठ धर्मपाल” थे।


पूरा शहर जिनका नाम इज़्ज़त से लेता था।


कुछ देर बाद सेठ धर्मपाल को होश आया।


उन्होंने सबसे पहला सवाल पूछा—


“जिस लड़के ने मेरी जान बचाई… वो कहाँ है?”


अर्जुन सामने आया।


सेठ जी ने उसकी तरफ देखा।


भीगे कपड़े…

कटे हुए हाथ…

थका हुआ चेहरा…


लेकिन आँखों में सच्चाई साफ दिखाई दे रही थी।


उन्होंने धीमे से पूछा—


“तुमने मेरी जान क्यों बचाई?”


अर्जुन हल्का मुस्कुराया—


“क्योंकि किसी की जान पैसों से बड़ी होती है।”


यह सुनकर सेठ धर्मपाल कुछ देर तक उसे देखते रहे।


फिर बोले—


“आज से तुम मेरे साथ काम करोगे।”


अर्जुन हैरान रह गया।


“लेकिन सेठ जी… मैं सिर्फ एक गरीब दर्जी हूँ…”


सेठ जी मुस्कुराए—


“नहीं बेटा… तुम गरीब नहीं हो।”


“जिस इंसान का दिल इतना बड़ा हो… वो कभी गरीब नहीं होता।”


अर्जुन की आँखें भर आईं।


उसे पहली बार लगा…

शायद भगवान ने उसकी जिंदगी बदलने का दरवाज़ा खोल दिया है।


लेकिन उसी समय गाँव में…


राधिका की तबीयत अचानक बहुत खराब हो गई।


वो बेहोश होकर जमीन पर गिर पड़ी।


पूरा घर घबरा गया।


डॉक्टर तुरंत हवेली पहुँचे।


कुछ देर बाद डॉक्टर बाहर आए।


उनके चेहरे पर चिंता साफ दिखाई दे रही थी।


ठाकुर महेंद्र सिंह डरते हुए बोले—


“क्या हुआ डॉक्टर साहब?”


डॉक्टर ने धीमी आवाज़ में कहा—


“अगर राधिका को जल्द खुश नहीं रखा गया…”


“तो माँ और बच्चे… दोनों की जान खतरे में पड़ सकती है…”


यह सुनते ही ठाकुर महेंद्र सिंह के पैरों तले जमीन खिसक गई 

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